तस्य सर्ववतारेषु
न विवेशोऽस्ति कश्चन
देही-देहा-विभेदश्च
न पारे विद्यते क्वचित्
सर्वऽवतारा व्याप्ताश्च
सर्व सूक्ष्माच तत्त्वतः
ऐश्वर्य-योगात् भगवान्
क्रीडत्येष जनार्दनः
"भगवान के किसी भी अवतार में कोई अंतर नहीं है, और उनके शरीर और उनकी आत्मा के बीच कोई अंतर नहीं है। सच में, सभी अवतार सर्वव्यापी और असीम सूक्ष्म हैं। इस प्रकार परम व्यक्तित्व जनार्दन अपनी भव्य शक्तियों का उपयोग करके खेलता है।"
बद्रीकाश्रम में भगवान नारायण अपने छोटे भाई नार के साथ धर्म के पुत्र के रूप में प्रकट होते हैं और तपस्वियों के लिए गुरु के रूप में कार्य करते हैं। पाठ 155 में शब्द आदि (कपिलादयः) का तात्पर्य व्यासदेव और धन्वंतरि सहित अन्य अवतारों से है, और पाठ 156 में शब्द आदि (स्वर्ग-लोक आदिषु) का तात्पर्य ब्रह्मलोक पर महर्लोक पर, सत्यलोक पर और ब्रह्मांडीय आवरणों में भगवान के अतिरिक्त प्रकटीकरण स्थानों से है। पृथ्वी और अन्य तत्वों से बना। पाठ 156 में आदि शब्द (विष्णु-यज्ञेश्वर आदि) का दूसरा प्रयोग ब्रह्मलोक पर भगवान महापुरुष और भगवान रूपों, जैसे वराह, की पूजा ब्रह्मांड की आवरणों में की जाती है। गोप-कुमार ने भगवान के इन कई रूपों को देखा है। यहां अलग से उल्लेखित श्री वामन का रूप चार हाथों वाले भगवान विष्णु से अलग है जो स्वर्गलोक पर स्थित देवता हैं।
जैसे हम पुराणों से सीखते हैं, भगवान विष्णु के कई अवतार अलग-अलग समय पर और अलग-अलग परिस्थितियों में एक से अधिक बार प्रकट होते हैं। यह ज्ञात है, उदाहरण के लिए, कि मछली का सबसे बड़ा मत्स्य ब्रह्मांड की विनाशकारी बाढ़ के दौरान वेदों को बचाने के लिए युगों के चक्र के अंत में एक बार प्रकट हुआ था और ब्रह्मांड के निचले हिस्से की आंशिक बाढ़ के दौरान एक बार फिर से सत्यव्रत मुनि पर अपनी दया दिखाने के लिए प्रकट हुआ। दो भगवान कूर्म भी हैं। एक ने अमृत को दूध सागर से मथने के दौरान अपनी पीठ पर मंदरा पर्वत को पकड़ रखा था, और दूसरा हमेशा पृथ्वी को थाम लेता है। इसी तरह, कम से कम पाँच भगवान वराह हैं। निर्माण की शुरुआत में पहला ब्रह्मा के नथुने से प्रकट हुआ, पृथ्वी को उठाया, उसे गर्भ सागर पर रखा और फिर गायब हो गया। दूसरे ने पृथ्वी को आंशिक बाढ़ से बचाया, हिरण्याक्ष को मार डाला और स्वर्गलोक गया। तीसरे, वैदिक यज्ञ के अवतार ने यज्ञ के तरीके सिखाए, पृथ्वी को उठाया, वराह पुराण से उसके बारे में बात की, और अपनी रहस्यमय शक्ति से गायब हो गया। चौथे ने पृथ्वी को लिया और अपने तीखे नुकीले दांतों से अत्यधिक बड़े पहाड़ों को पीसकर उसे समतल किया। पृथ्वी ने तब अपनी पत्नी वराही का रूप धारण किया, उसके साथ आनंद लिया और दो पुत्रों को जन्म दिया। वह भगवान वराह अंत में भगवान नृसिंह के रूप में विलीन होकर गायब हो गए। और अभी तक एक पाँचवाँ वराहदेव पृथ्वी को नीचे से सदा ऊपर रखता है। भगवान नृसिंह ने भी कई अलग-अलग रूप धारण किए, जैसा कि हम बृहत-सहस्र-नाम-स्तोत्र जैसे स्रोतों से जानते हैं। एक नृसिंह ने सभी दिव्य माताओं को हरा दिया, दूसरे ने हिरण्यकश्यपु को चीर दिया, और फिर भी एक ने एक साधारण बिल्ली का रूप धारण किया। दो अलग-अलग असुरों, धुंधु और बाली को धोखा देने के लिए वामनदेव की दो उपस्थितियाँ भी थीं, और भगवान हयग्रीव और भगवान हंस में से प्रत्येक के दो-दो प्रकटीकरण थे।
