श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.4.144 
सहस्र-वक्त्राः सूर्येन्दु-
वायु-वह्न्य्-आदि-रूपिणः
चतुर्-भुजादि-रूपाश् च
तत्-तद्-वेशादि-रूपिणः
 
 
अनुवाद
कुछ ने हज़ार मुखों वाला शरीर धारण किया है, या वायु और अग्नि जैसे देवताओं के समान आकृतियाँ धारण की हैं। कुछ की चार, आठ, बारह या उससे अधिक भुजाएँ हैं, और विभिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण, प्रतीक और अन्य गुण हैं।
 
Some have bodies with a thousand faces, or resemble deities like Vayu and Agni. Some have four, eight, twelve, or more arms, and possess a variety of clothing, ornaments, symbols, and other attributes.
तात्पर्य
श्रीमद-भागवतम् (२.९.११-१२) में वैकुण्ठ के निवासियों को सर्वोच्च प्रभु के समान दिखने वाला और विविध शारीरिक रंग वाले बताया गया है:

श्यामावदाताः शत-पत्र-लोचनाः

पिषांग-वस्त्राः सु-रुचः सु-पेससः

सर्वे चतुर्-बाहव उन्मीषन-मणि-

प्रवेक-निष्काभरणाः सु-वरचसः

प्रवाल-वैदूर्य-मृणाल-वरचसः

परिसफुरत्-कुंडल-मौलि-मालिनाः

"वैकुण्ठ ग्रहों के निवासियों का आकाश जैसा-नीला रंग होता है। उनकी आंखें कमल के फूलों से मिलती हैं, उनका पहनावा पीले रंग का है, और उनकी शारीरिक बनावट बहुत आकर्षक है। उनकी आयु युवावस्था की होती है। उन सभी के चार हाथ हैं, वे मोतियों का हार और अलंकृत पदक पहने हुए हैं, और वे सभी तेजोमय दिखाई देते हैं। कुछ मूँगा, हीरे या सफेद कमल के रेशों जैसे रंग के होते हैं। उनके सिर और गले पर मालाएँ हैं, और वे चमकीले कान के छल्ले पहने हुए हैं।"

पाठ्य 144 से 147 में, नारद शारीरिक रूप, वेशभूषा, आदि की इस विविधता का कुछ विस्तार से चित्रण करते हैं। कुछ वैकुण्ठ भक्त श्री रघुनाथ जैसे प्रभु के अवतारों के साथ सारूप्य-रूप में समानता- प्राप्त करने के कारण मनुष्य के रूप में दिखाई देते हैं। अन्य भगवान कपिलदेव जैसे ऋषियों के अवतारों के साथ सारूप्य से मुनि के रूप में, या भगवान सत्यसेन और भगवान विभु जैसे मन्वंतर-अवतारों के साथ सारूप्य से देवताओं के रूप में दिखाई देते हैं। अन्य भगवान परशुराम जैसे अवतारों के साथ सारूप्य से ऋषियों के रूप में, या भगवान मत्स्य के साथ सारूप्य से मछली के रूप में, या भगवान कूर्म के साथ कछुए के रूप में दिखाई देते हैं। कुछ, जो शिव या ब्रह्मा को सर्वोच्च के प्रतिनिधि के रूप में पूजते हैं, तीन आँखों या चार सिर वाले शरीर में दिखाई देते हैं। कुछ इंद्र की तरह हजारों आँखों वाले, अनंत शेष की तरह हजारों सिर वाले, या सूर्य या अन्य देवताओं की तरह दिखाई देते हैं। ऐंद्र-श्रुति जैसे वैदिक शास्त्र, इंद्र की महिमामंडन करने वाले मंत्र, सर्वोच्च प्रभु के प्रतिनिधियों के रूप में ऐसे देवताओं की पूजा का समर्थन करते हैं। श्रीमद-भागवतम् के पंचम खंड में हम सूर्य जैसे देवताओं को भी पाते हैं, जिन्हें प्लक्ष-द्वीप और भूर-लोक ग्रह प्रणाली के अन्य प्रभागों में प्रभु के प्रतिनिधियों के रूप में पूजा जाता है।

वैकुंठ में प्रवेश प्राप्त करने का एकमात्र साधन सर्वोच्च प्रभु के चरण कमलों के लिए शुद्ध, अनन्य प्रेम है। साधारण देवता उपासक कभी भी वैकुण्ठ के निवासी बनने के पात्र नहीं होते हैं, लेकिन जो उपासक शिव और अन्य देवताओं को भगवान विष्णु से अलग नहीं मानते हैं, वे विशेष वैष्णव पूर्णता प्राप्त करते हैं। जैसा कि वामन पुराण और अन्य शास्त्रों में वर्णित है, वे भक्त उन सर्वोच्च प्रभु के साथियों में शामिल हो जाते हैं जिनकी वे पूजा करते हैं, या तो प्रभु के देवता प्रतिनिधियों के संबंधित ग्रहों पर या, कुछ मामलों में, एक वैकुंठ ग्रह पर, जहाँ भक्तों को उन देवताओं की विशेष संपन्नता प्राप्त होती है।

वैकुण्ठ-वासी जिनके शरीर भगवान विष्णु के भौतिक सृजन के लिए पहले अवतार महापुरुष के दिव्य शरीर जैसे हैं, वे वे हैं जिन्होंने उनकी पूजा करके सारूप्य प्राप्त किया है। उनके हजारों हाथ, पैर, सिर और अन्य अंग हैं। पाठ्य 144 में, शब्द आदि ("और इसी तरह") दो बार आता है। पहली बार, यह इंगित करता है कि वैकुण्ठ के कुछ भक्त ऐसे शरीर ग्रहण करते हैं जो यमराज और आर्यमा जैसे अन्य देवताओं के समान होते हैं, जो सर्वोच्च प्रभु की विभिन्न व्यक्तिगत शक्तियों के भौतिक प्रतिनिधि हैं। दूसरी बार, आदि इंगित करता है कि सामान्य चार भुजाओं के अलावा, कुछ वैकुण्ठ भक्तों के आठ हाथ, बारह हाथ या उससे अधिक होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)