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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)
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श्लोक 138
श्लोक
2.4.138
मदीय-कर्णयोः स्वीय-
जिह्वायाश् च सुखाय सः
व्यञ्जयाम् आस सङ्क्षेपात्
सर्वांस् तान् मद्-धृदि स्थितान्
अनुवाद
मेरे कानों को तथा अपनी जीभ को आनंद देने के लिए उन्होंने उन सभी विषयों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जिन पर मैं विचार कर रहा था।
To the delight of my ears and his tongue, he briefly shed light on all the subjects I was considering.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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