तब यहां भी आपका हृदय परम आनंद से भर जाएगा, असीमित और निरंतर बढ़ता हुआ।
Then here too your heart will be filled with supreme joy, boundless and ever-increasing.
तात्पर्य
नारायण और गोपाल एक ही हैं, इस बात को समझने से गोपा-कुमार को जो आनंद प्राप्त होगा, वह उनके हृदय की मांगों को संतुष्ट कर देगा। वह आनंद सदा बढ़ता ही जाएगा क्योंकि हर पल undiscovered मिठास की नई भावनाएँ प्रकट होती रहेंगी। लेकिन गोपा-कुमार सोच सकते हैं कि उस नई-नवेली खुशी की नवीनता घिस जाएगी। नारद कहते हैं, "बिल्कुल नहीं।" "वह आनंद सर्वथा परिपूर्ण है।" लेकिन यदि उसमें निरंतर बढ़ोतरी होती रहती है, तो क्या उसकी एक सीमा नहीं होगी, भले ही वह सीमा बदलती ही क्यों न हो? नारद कहते हैं, "नहीं।" "वह आनंद असीमित है।" उसका कोई सीमित माप नहीं है; उसकी गुणवत्ता निरंतर बढ़ती जाती है। शुरू में ही, जब कोई भक्त उस आनंद को पाना शुरू करता है, तो वह अपने सभी पहलुओं में लगभग पूर्ण प्रतीत होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥