श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.4.13 
सम्भ्रमात् प्रणमन्तं माम्
आश्लिष्याश्वासयन् मुहुः
ऐच्छन् स्व-सदृशं रूपं
दातुं युक्ति-शतेन ते
 
 
अनुवाद
जब मैंने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया, तो प्रभु के उन गणों ने मुझे गले लगा लिया और बार-बार आश्वस्त किया। सैकड़ों तर्क प्रस्तुत करते हुए, वे मुझे अपने जैसा शरीर देने की इच्छा रखते थे।
 
When I bowed down with reverence, the Lord's followers embraced me and repeatedly reassured me, presenting hundreds of arguments, wishing to give me a body like theirs.
तात्पर्य
नारायण के सहयोगियों ने गोप-कुमार को आश्वासन दिया कि उन्हें इतना आश्चर्य नहीं करना चाहिए और उनके साथ इतना सम्मानपूर्वक व्यवहार न करना चाहिए। वे उनके मित्र थे, उन्होंने उसे बताया और अब वे उसे बैकुंठ ले जा रहे थे। इसके अलावा, उन्होंने उसे अपने जैसे ही चार भुजाओं वाले वैकुण्ठ शरीर को स्वीकार करने के लिए मनाने की भी कोशिश की। उनका तर्क था कि उनका मानव शरीर वैकुण्ठ में रहने के लिए उपयुक्त नहीं था; यह वैकुण्ठ जीवन का पूरी तरह से आनंद लेने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)