श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  2.4.128 
श्रुत्वा तद् अखिलं किञ्चिन्
निश्वस्य परितो दृशौ
सञ्चार्याकृष्य मां पार्श्वे
’ब्रवीत् स-करुणं शनैः
 
 
अनुवाद
मेरी पूरी कहानी सुनने के बाद, नारद ने हल्की सी आह भरी, चारों ओर देखा, मुझे अपने पास खींचा और करुणापूर्वक, मधुर स्वर में मुझसे बोले।
 
After listening to my entire story, Narada sighed slightly, looked around, pulled me close and spoke to me in a compassionate, sweet voice.
तात्पर्य
नारद गोपाकुमार के असंतोष को समझ सकते थे क्योंकि नारद भी वैसा ही महसूस करते थे। नारद खुद को दुर्भाग्यशाली समझते थे कि वे वैकुंठ के ऊपर वाले उस खास संसार को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। गोपाकुमार द्वारा इसकी याद दिलाए जाने से वह दुखी हुए, लेकिन गोपाकुमार को और अधिक परेशान करने से बचने के लिए उन्होंने अपने दुख को छिपा लिया। यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे अकेले हैं, चारों ओर देखने के बाद, उन्होंने गोपाकुमार को अपनी ओर खींचा ताकि उन्हें कुछ गोपनीय बात बताई जा सके। नारद विशेष रूप से दयालु महसूस कर रहे थे; वास्तव में, वह करुणा नामक उस आनंदित रस में पूरी तरह से लीन थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)