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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)
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श्लोक 111
श्लोक
2.4.111
तथाप्य् अस्यां व्रज-क्ष्मायां
प्रभुं स-परिवारकम्
विहरन्तं तथा नेक्षे
खिद्यते स्मेति मन्-मनः
अनुवाद
फिर भी मेरा मन दुःखी होता, क्योंकि मैं भगवान और उनके साथियों को ब्रज भूमि पर खेलते हुए नहीं देख पाता।
Still my heart was sad because I could not see God and his friends playing on the land of Braj.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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