श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.4.107 
कृष्णस्य भक्त-वात्सल्याद्
यस्य कस्यापि कर्मणः
सङ्कीर्तनं महान् एव
गुणः श्री-प्रभु-तोषणः
 
 
अनुवाद
"कृष्ण अपने भक्तों के प्रति इतने दयालु हैं कि उनकी किसी भी गतिविधि का संकीर्तन हमारे दिव्य स्वामी के लिए गौरवशाली और लाभदायक तथा संतुष्टिदायक है।"
 
"Krishna is so kind to His devotees that chanting any of their activities is glorious, beneficial, and gratifying to our divine master."
तात्पर्य
अब वैकुण्ठ वासियों जो सर्वोत्तम सर्वोच्च भगवान की महिमा को समझते हैं, वे बोल रहे हैं। सभी भगवान के लीलाएँ अलौकिक हैं, और उनमें से किसी को भी महिमा मंडित करना शुभ है क्योंकि प्रभु उन्हें अपने भक्तों के लाभ के लिए बनाते हैं। जैसा कि उन्होंने अपने शब्दों में कहा है:

मुहूर्तेनापि संहर्तु

शक्तो यदि अति दानवान

मद-भक्ताना विनोदार्थ

करोमि विविधाः क्रियाः

दर्शन-ध्यान-संस्पर्शैर्

मत्स्य-कूर्म-विहंगामाः

स्वान्य अपत्यानि पुष्णन्ति

तथाहम् अपि पद्मजा

"हालांकि मैं सभी राक्षसों को कुछ ही मिनटों में नष्ट कर सकता हूं, मैं सिर्फ अपने भक्तों का मनोरंजन करने के लिए विभिन्न लीला करता हूं। जैसे मछली, कछुआ और पक्षी क्रमशः उन्हें देखकर, उन पर ध्यान करके और उन्हें शारीरिक संपर्क में रखकर अपने वंश को पोषित करते हैं, इसी तरह मैं भी अपने भक्तों को बनाए रखता हूं, हे कमल-जन्म ब्रह्मा।" (पद्म पुराण)

इसलिए, सर्वोच्च भगवान की किसी भी गतिविधि माया, भौतिक भ्रम की रचनाएं नहीं हैं, और न ही वे बच्चों के खेलों की तरह निरर्थक हैं। हालाँकि, अलग-अलग भक्त अलग-अलग तरीकों से भगवान की लीलाओं को समझते हैं। वैकुण्ठ के निवासियों में से अब गोपा-कुमार के साथ बात कर रहे हैं, हम तीन अलग-अलग मानसिकता वाले तीन अलग-अलग समूहों को समझ सकते हैं। पहला समूह व्रज की अनौपचारिक लीलाओं को वैकुण्ठ के मूड के साथ असंगत मानता है, दूसरा अधिक उदार है, और तीसरा प्रभु की किसी भी लीला के खिलाफ भेदभाव करने से सख्ती से इनकार करता है।

वैकुण्ठ में भक्तों के इन अलग-अलग दृष्टिकोण दो कारणों से हैं: पहला, भक्ति विभिन्न तरीकों से गुणों को लेती है जैसे कि इसे प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले विभिन्न विषयों की खेती, ज्ञान की खेती। दूसरा, भगवान के व्यक्तित्व को, उनके विभिन्न लीलाओं के लिए, अपने भक्तों में अलग-अलग मूड की आवश्यकता होती है।

किसी भी मामले में, वैकुण्ठ भक्तों में से किसी ने भी कुछ भी गलत नहीं कहा है। बिना किसी संदेह के, किसी भी रूप में शुद्ध भक्ति सेवा किसी को सर्वोच्च लाभ कमा सकती है, यहाँ तक कि श्री वैकुण्ठ-धाम में प्रवेश भी कर सकती है। यह पहले से ही तार्किक रूप से स्थापित हो चुका है, और इसकी आगे चर्चा बृहद-भागवतमीर के बाद के अध्यायों में की जाएगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)