श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.3.93 
वसन्ति च तपो-लोके
प्रभुं नारायणं विना
अनाथानाम् इव क्षेमं
वहन्तस् तन्-निवासिनाम्
 
 
अनुवाद
वे तपोलोक में रहते हैं, जहां वे निवासियों को आश्वासन और सुरक्षा प्रदान करते हैं, जो कभी-कभी अपने भगवान नारायण की अनुपस्थिति में असहाय महसूस करते हैं।
 
They reside in Tapoloka, where they provide reassurance and protection to the residents, who sometimes feel helpless in the absence of their Lord Narayana.
तात्पर्य
गुप्तकुमार को आश्चर्य हो सकता है कि आत्माराम कुमार ऋषि, वैकुंठ से आए उदारतापूर्ण आगंतुकों के साथ क्यों गए थे। इस शंका का निवारण करने के लिए, श्री गणेश, 92 से 95वें ग्रंथ का उल्लेख करते हैं। वैकुंठ के दूत भगवान वैकुंठ-नाथ के सेवक हैं, और चारों कुमार उसी भगवान के शक्त्यवेश अवतार हैं। इसलिए, जहां भी जाते हैं, व्यक्तिगत उदाहरण से, कुमार भगवान नारायण की भक्ति सेवा के उद्देश्य को बढ़ावा देते हैं। वे अधिकांश समय तपोलोक पर व्यतीत करते हैं क्योंकि वहां निवास करने वाले योग के ब्रह्मचारी गुरुजन, उनके निर्देशन पर निर्भर करते हैं। कुमार उन्हें योग के मार्ग सिखाते हैं और सर्वोच्च भगवान के बारे में बोलकर और उनकी महिमा का सामूहिक जप कराकर उनके लिए उच्चतम सौभाग्य की भी रचना करते हैं। जैसा कि इस श्लोक में शब्द 'इव' द्वारा व्यक्त किया गया है, जब भगवान विष्णु तपोलोक से अनुपस्थित होते हैं, तो निवासी ऐसा महसूस करते हैं जैसे उनका उनसे संपर्क टूट गया है, लेकिन ध्यान में वे हमेशा उन्हें देखते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)