श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.3.64 
सदैक-रूपो भगवान् शिवो ’यं
वसन् स्व-लोके प्रकटः सदैव
विलोक्यते तत्र निवास-तुष्टैस्
तद्-एक-निष्ठैः सततं निजेष्टैः
 
 
अनुवाद
महान भगवान शिव का एक शाश्वत दिव्य रूप है। अपने धाम में निवास करते हुए, वे अपने अनन्य उपासकों को सदैव प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, जो वहाँ निवास करने में प्रसन्न होते हैं।
 
The great Lord Shiva has an eternal divine form. Residing in his abode, he is always visible to his devoted devotees who delight in residing there.
तात्पर्य
श्री नंदीश्वर के अनुसार, भगवान शिव हमेशा एक ही रूप में रहते हैं, जिसका अर्थ यह है कि वह भगवान महाकाल की तरह नहीं होते, जो कभी निराकार होते हैं और कभी साकार, न ही वह भगवान विष्णु की तरह मत्स्य, कछुआ इत्यादि विभिन्न रूपों में अपना विस्तार करते हैं। भगवान शिव अपने भक्तों के आनंद के लिए कभी-कभी शिकारी या मछुआरे के रूप में प्रच्छन्न प्रकट होते हैं, परंतु वह जीवन की विभिन्न प्रजातियों में रूपांतरित नहीं होते। क्योंकि भगवान शिव के अनुयायी निश्चिंत रह सकते हैं कि वह अपना रूप बदलने वाले नहीं हैं, इसलिए वे हमेशा संतुष्ट रहते हैं। वह अपने ग्रह पर हमेशा दृष्टिगोचर होते हैं, भगवान विष्णु की तरह नहीं जो अक्सर अपने निवास स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों पर जाते हैं। भगवान शिव के प्रिय भक्त अपने प्रभु को हमेशा देख सकते हैं, श्री विष्णु, श्री यज्ञेश्वर और स्वर्गलोक, महर्लोक, तपोलोक और सत्यलोक जैसे अन्य अवतारों के भक्तों के विपरीत।

यह स्पष्टीकरण श्री नंदीश्वर द्वारा दिया गया है, लेकिन अधिक सटीक रूप से भगवान शिव हमेशा एक ही रूप में होते हैं, इस अर्थ में कि उनका शरीर हमेशा विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक, सच्चिदानंद होता है, और कभी परिवर्तन के अधीन नहीं होता। वह हमेशा अपने निवास स्थान में उपस्थित रहते हैं, भौतिक सृष्टि से परे, और इसलिए अपने भक्तों के आनंद के लिए उस निवास स्थान में हमेशा दृष्टिगोचर रहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)