ते वा अमुष्या वदनासित-पद्म-कोशं
उद्वीक्ष्य सुंदरतराधर-कुंड-हासं
लब्धाशिष: पुनर अवेक्ष्य तदीयं अँघ्रि-
द्वंद्वं नखारुण-मणि-श्रयणं निदध्यू:
"भगवान का सुंदर चेहरा उन्हें अंदर से एक नीले कमल की तरह दिखाई दिया, और भगवान की मुस्कुराहट एक खिले हुए चमेली के फूल की तरह दिखाई दी। भगवान के चेहरे को देखने के बाद, ऋषि पूरी तरह से संतुष्ट थे, और जब वे उन्हें और देखना चाहते थे तो उन्होंने उनके चरण कमलों के नाखूनों को देखा, जो माणिक्य के समान थे। इस प्रकार उन्होंने भगवान के दिव्य शरीर को बार-बार देखा, और इसलिए वे अंततः भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप पर ध्यान प्राप्त कर सके।"
इस श्लोक में निध्यै क्रिया से शब्द निदध्यू: का अर्थ है "गहराई से ध्यान करना", यह इंगित करता है कि जब कुमारों ने भगवान को देखा तो वे ध्यानपूर्ण चिंतन में निष्क्रिय रूप से वापस चले गए। लेकिन जैसा कि वैकुंठ-दूत बताते हैं, हमें केवल इन लक्षणों की बाहरी आकृति से निर्णय नहीं लेना चाहिए। आँखें बंद करना और शारीरिक हलचलों को रोकना ध्यान की समाधि के संकेत नहीं हैं; वे इसके बजाय भवों, भक्ति के उल्लास की शारीरिक अभिव्यक्तियाँ हो सकते हैं, जो उल्लास के अन्य शारीरिक संकेतों जैसे कंपकंपी, पसीना और शरीर के बालों के खड़े होने के समान हैं। मैत्रेय मुनि ने कुमारों के उल्लास को "ध्यान" के रूप में वर्णित किया क्योंकि यह केवल बाहरी रूप से ऐसा लगता था। इसलिए अपनी आँखों से सीधे भगवान को देखने की श्रेष्ठता अपराजित है।
