श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  2.3.167 
नाम्नां तु सङ्कीर्तनम् आर्ति-भारान्
मेघं विना प्रावृषि चातकानाम्
रात्रौ वियोगात् स्व-पते रथाङ्गी-
वर्गस्य चाक्रोशन-वत् प्रतीहि
 
 
अनुवाद
जैसे वर्षा ऋतु के बादल रहित दिन में चातक पक्षियों का व्यथित क्रंदन, या रात्रि में अपने पतियों से वियोग में चक्रवाकी पक्षियों के समूह का विलाप, उसी प्रकार जब मनुष्य अत्यधिक दुःख से ग्रस्त होता है, तब भगवान के नामों का संकीर्तन उत्पन्न होता है।
 
Just as the anguished cry of the Chatak birds on a cloudless day in the rainy season, or the lamentation of a flock of Chakravaki birds separated from their husbands at night, similarly, when a person is afflicted with extreme sorrow, the chanting of the names of the Lord arises.
तात्पर्य
वास्तव में नामा संकीर्तन तभी प्रकट होता है जब प्रेम विशेष तरीके से बढ़ जाता है। पारलौकिक जिज्ञासा से समृद्ध प्रेम का परिणाम संकीर्तन होता है। हमारी समझ बनाने में मदद करने के लिए, वैकुण्ठ-दूत चातक और चक्रवाकी पक्षियों का उदाहरण देते हैं। चातकों की मर्मभेदी आवाज, प्रिया प्रिया ("मेरे प्रिय, मेरे प्रिय!") जैसी लगती है, जो बरसात के मौसम के बादल रहित दिनों में गूँजती है। और जब रात में उनके पति दूर होते हैं तो चक्रवाकी पक्षियों का विलाप आसमान को भर देता है। ऐसे ही, जब कोई शुद्ध ईश्वरीय प्रेम में भगवान से अलग होने का अनुभव करता है, तो नामा संकीर्तन उत्पन्न होता है। भगवान-नामा-संकीर्तन करने का सही तरीका यह है कि अपने प्रिय भगवान को पीड़ा में पुकारा जाए, और उन्हें आकर्षित करने के लिए अपनी भावनाओं को विभिन्न मधुर गीतों में व्यक्त किया जाए। जैसा कि दार्शनिक कहावत में कहा गया है, सिद्धस्य लक्षणं यत् स्यात्/ साधनं साधकस्य तत्: “साधक और साधना के साधन उनके लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिए।”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)