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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)
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श्लोक 162
श्लोक
2.3.162
एकस्मिन्न् इन्द्रिये प्रादुर्-
भूतं नामामृतं रसैः
आप्लावयति सर्वाणीन्-
द्रियाणि मधुरैर् निजैः
अनुवाद
जब भगवान के नाम का अमृत एक ही इंद्रिय में प्रकट होता है, तो सभी इंद्रियाँ अपने-अपने मधुर स्वाद से भर जाती हैं।
When the nectar of the Lord's name appears in a single sense, all the senses are filled with their respective sweet tastes.
तात्पर्य
इस तरह नाम-संकीर्तन से हर संभव आनंद प्राप्त किया जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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