श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.3.157 
एकाकित्वेन तु ध्यानं
विविक्ते खलु सिध्यति
सङ्कीर्तनं विविक्ते ’पि
बहूनां सङ्गतो ’पि च
 
 
अनुवाद
ध्यान एकांत स्थान पर अकेले सफलतापूर्वक किया जा सकता है, लेकिन संकीर्तन या तो एकांत में या कई अन्य लोगों की संगति में किया जा सकता है।
 
Meditation can be done successfully alone in a secluded place, but sankirtana can be done either in solitude or in the company of many other people.
तात्पर्य
वैकुंठ दूत ध्यान की प्रक्रिया का बहुत आदर करते हैं पर उनकी अपनी पसंद सांकीर्तन की प्रक्रिया है। ध्यान इसलिए सीमित है क्योंकि ध्यान करने के लिए एकांत की आवश्यकता होती है ताकि उसमे व्यवधान ना पड़े।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)