श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  2.3.147 
भक्तिः प्रकृष्टा स्मरणात्मिकास्मिन्
सर्वेन्द्रियाणाम् अधिपे विलोले
घोरे बलिष्ठे मनसि प्रयासैर्
नीते वशं भाति विशोधिते या
 
 
अनुवाद
वे सोचते हैं कि स्मरण के रूप में श्रेष्ठ भक्ति मन के भीतर प्रकट होती है - जो सभी इंद्रियों में अशांत, भयावह और शक्तिशाली प्रमुख है - जब गंभीर प्रयासों से मन को वश में कर लिया जाता है और उसे पूरी तरह से शुद्ध कर लिया जाता है।
 
They think that supreme devotion in the form of remembrance manifests within the mind – which is the turbulent, fearful and powerful dominant of all the senses – when by earnest efforts the mind is subdued and completely purified.
तात्पर्य
हर किसी को अनुभव होता है कि मन को वश में करना कठिन होता है। इसे वशीभूत करना और पवित्र करना एक महान उपलब्धि है। क्योंकि मन इंद्रियों का स्वामी है, जब मन वश में हो जाता है, तो कीर्तन सहित इंद्रियों के कार्य भी वश में हो जाते हैं। श्रीमद्-भागवतम् (11.23.47, 45) में अवंती के तपस्वी के शब्दों में:

मनो-वशे 'न्ये ह्य भवन् स्म देवा

मनश् च नान्यस्य वशं समेति

भीष्मो हि देवः सहासः सहियान

युंञ्ज्याद् वशे तं स हि देव-देवः

"सभी इंद्रियाँ अनादिकाल से मन के अधीन रही हैं, और मन स्वयं कभी भी किसी अन्य इंद्रिय के अधीन नहीं होता है। वह सबसे मजबूत से भी मजबूत है, और उसकी ईश्वरीय शक्ति भयावह है। इसलिए, जो कोई भी मन को वश में कर सकता है, वह सभी इंद्रियों का स्वामी बन जाता है।"

दानं स्व-धर्मो नियमो यमश् च

श्रुतं च कर्माणि च सद-व्रतानि

सर्वे मनो-निग्रह-लक्षणान्ताः

परो हि योगो मनसः समाधिः

"दान, निर्धारित कर्तव्य, प्रमुख और लघु विनियामक सिद्धांतों का पालन, शास्त्र से श्रवण, पुण्य कार्य करना और पवित्र प्रतिज्ञाओं का पालन करना अंततः सभी का उद्देश्य मन को वश में करना है। वास्तव में, परम परमात्मा पर मन की एकाग्रता सर्वोच्च योग है।"

इसलिए, तपोलोक के निवासियों की राय में, कोई अपने मन को नियंत्रित करके और उसे परमेश्वर के स्मरण में लगाकर सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)