मनो-वशे 'न्ये ह्य भवन् स्म देवा
मनश् च नान्यस्य वशं समेति
भीष्मो हि देवः सहासः सहियान
युंञ्ज्याद् वशे तं स हि देव-देवः
"सभी इंद्रियाँ अनादिकाल से मन के अधीन रही हैं, और मन स्वयं कभी भी किसी अन्य इंद्रिय के अधीन नहीं होता है। वह सबसे मजबूत से भी मजबूत है, और उसकी ईश्वरीय शक्ति भयावह है। इसलिए, जो कोई भी मन को वश में कर सकता है, वह सभी इंद्रियों का स्वामी बन जाता है।"
दानं स्व-धर्मो नियमो यमश् च
श्रुतं च कर्माणि च सद-व्रतानि
सर्वे मनो-निग्रह-लक्षणान्ताः
परो हि योगो मनसः समाधिः
"दान, निर्धारित कर्तव्य, प्रमुख और लघु विनियामक सिद्धांतों का पालन, शास्त्र से श्रवण, पुण्य कार्य करना और पवित्र प्रतिज्ञाओं का पालन करना अंततः सभी का उद्देश्य मन को वश में करना है। वास्तव में, परम परमात्मा पर मन की एकाग्रता सर्वोच्च योग है।"
इसलिए, तपोलोक के निवासियों की राय में, कोई अपने मन को नियंत्रित करके और उसे परमेश्वर के स्मरण में लगाकर सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करता है।
