श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.3.144 
परं श्रीमत्-पदाम्भोज-
सदासङ्गत्य्-अपेक्षया
नाम-सङ्कीर्तन-प्रायां
विशुद्धां भक्तिम् आचर
 
 
अनुवाद
भगवान के दिव्य चरणकमलों का शाश्वत संपर्क प्राप्त करने की आशा के साथ, मुख्यतः नाम-संकीर्तन के रूप में, शुद्ध भक्ति सेवा का अभ्यास करें।
 
Practice pure devotional service, primarily in the form of nama-sankirtana, with the hope of attaining eternal contact with the transcendental feet of the Lord.
तात्पर्य
भगवान-नाम-संकीर्तन अर्थात भगवान का पवित्र नाम ऊंचे स्वर में बोलना, वैकुण्ठ की प्राप्ति के लिए सबसे प्रभावी मार्ग है, अथवा व्यक्ति को जो कुछ भी इच्छा हो। परंतु, इस संकीर्तन को निष्काम भाव से करना चाहिए जिसमें कर्म और ज्ञान से जुड़ी कोई आकांक्षा ना हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)