विशुद्धे तु विवेकेन
सत्य् आत्मनि हरेः पदम्
गते ’प्य् अप्राकृतं भक्ति-
विधयो विलसन्ति हि
अनुवाद
जब आध्यात्मिक विवेक द्वारा भक्त हृदय से पूर्णतया शुद्ध हो जाता है और भगवान के दिव्य धाम को प्राप्त कर लेता है, तो उसे भक्ति की अद्भुत विविधता का बोध होता है।
When the devotee becomes completely purified in heart by spiritual discernment and attains the transcendental abode of the Lord, he realizes the wonderful variety of devotion.
तात्पर्य
इस श्लोक में आकांक्षी वैष्णव आध्यात्मिक रूप से किस तरह बनता है, इसका तर्क सकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है और अगले श्लोक में नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। आत्मा को भौतिकता से अलग करना सीखकर, एक भक्त अपनी चेतना को धीरे-धीरे भौतिक शरीर, उसके इंद्रियों और इस दुनिया की चीजों से उलझने से मुक्त करता है। भगवद-गीता (5.9) में श्री कृष्ण अर्जुन को इस प्रकार के भेदभाव का वर्णन करते हैं। इंद्रियाणिंद्रियार्थेषु वर्तंते इति धारयन्: "एक व्यक्ति को पता चलता है कि इंद्रियां बस उनकी वस्तुओं के साथ बातचीत कर रही हैं।" जब कोई अंततः सभी भौतिक संपर्कों से मुक्त हो जाता है, तो वह वैकुण्ठ में प्रवेश कर सकता है, जो भगवान हरी का राज्य है, जहाँ भौतिकता से कोई संबंध नहीं है। वहाँ कोई जीवन की वास्तविक विविधताओं का आनंद ले सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥