नाहं वसामि वैकुंठे
योगिनां हृदये न च
मद्भक्ता यत्र गायंति
तत्र तिष्ठामि नारद
"मैं वैकुण्ठ में या योगियों के हृदय में वास नहीं करता हूँ। मैं इसके बजाय, हे नारद, वहाँ होता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरी महिमा गाते हैं।"
वैकुंठ-दूत बताते हैं कि एक कारण है कि भक्तों के लिए वैकुण्ठ-लोक भौतिक जगत से अधिक वांछनीय है: केवल पारलौकिक दुनिया में, वैकुण्ठ में, सर्वोच्च भगवान हमेशा अपने सभी विविध आकर्षण, सुंदरता, लीलाओं और व्यक्तिगत गुणों के साथ दिखाई देते हैं।
