श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  2.3.128 
तेषां कस्मिंश्चिद् एकस्मिन्
श्रद्धयानुष्ठिते सति
स्वयम् आविर्भवेत् प्रेमा
श्रीमत्-कृष्ण-पदाब्जयोः
 
 
अनुवाद
जब कोई भक्ति के इन रूपों में से किसी एक में भी विश्वास के साथ संलग्न होता है, तो श्रीकृष्ण के चरणकमलों के प्रति शुद्ध प्रेम स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है।
 
When one engages with faith in any one of these forms of devotion, pure love for the lotus feet of Sri Krishna automatically arises.
तात्पर्य
जैसे कि श्री चैतन्य चरितामृत (मध्य २२.६२) में श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील सनातन गोस्वामी को समझाया, श्रद्धा या विश्वास को भक्तिपूर्ण प्रक्रिया की क्षमता में 'विश्वास' (विश्वास) के संदर्भ में ठीक से समझा जाता है:

'श्रद्धा'-शब्द में विश्वास कहते सुदृढ़ निश्चय

कृष्ण भक्ति करने पर सर्व-कर्म कृत होता है

"कृष्ण को दिव्य प्रेममय सेवा करने से व्यक्ति स्वचालित रूप से सभी सहायक गतिविधियों को करता है।" भक्तिपूर्ण सेवा के निर्वहन के लिए अनुकूल इस आश्वस्त, दृढ़ विश्वास को श्रद्धा कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)