श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.3.11 
पूर्वं ये बहु-कालेन
सम्प्राप्ताः क्रमशो ’धुना
सर्वे निमेषतः क्रान्ता
युगपन् मनसेव ते
 
 
अनुवाद
जिन ग्रहों को मैंने पहले एक-एक करके, लम्बे समय में प्राप्त किया था, अब मैं पलक झपकते ही पार कर गया, मानो केवल अपने मन की शक्ति से।
 
The planets I had previously reached one by one, over a long period of time, I now crossed in the blink of an eye, as if by the power of my mind alone.
तात्पर्य
गोपा-कुमार स्वर्ग, माहर, तपस् और सत्य लोक की यात्रा कर चुके थे और इनमें से हरेक ग्रह पर कुछ समय के लिए रुके थे। अब वे इन्हीं ग्रहों के ऊपर चित्त की गति से जा रहे थे। यह कहा जा सकता है कि श्रीकृष्णलीला के ये आध्यात्मिक लोक प्रकृति के गुणों के मेल से बने हैं। इसलिए, जब व्यक्ति अपने चित्त को अपने वश में कर लेता है, तो वह इन लोकों को अलग-अलग तत्वों से बने नहीं देख पाता है। इस अर्थ में, इस ब्रह्मांड से बाहर निकल जाना केवल चित्त का ही एक प्रयास है। लेकिन चूँकि गोपा-कुमार ने भौतिक रूप से सूर्यमंडल के बाहर निकले थे, इसलिए उन्हें प्रयास करना पड़ा था। इसीलिए, "मनसा" (चित्त से) शब्द में "इव" (मानो) शब्द जोड़ा गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)