श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  2.3.104 
निष्कामेषु विशुद्धेषु
स्व-धर्मेषु हि यः पुमान्
परां निष्ठां गतस् तस्मिन्
या कृपा श्री-हरेर् भवेत्
 
 
अनुवाद
केवल वही व्यक्ति श्री हरि की कृपा प्राप्त कर सकता है जिसने अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूर्णतः पूरा कर लिया है, जो शुद्ध है, जो स्वार्थ से मुक्त है।
 
Only that person can receive the grace of Sri Hari who has completely fulfilled his religious duties, who is pure, who is free from selfishness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)