श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  2.1.90 
घनान्धकारारण्यान्तः
सो ’पश्यन् कञ्चिद् उन्मुखः
निर्धार्य तद्-ध्वनि-स्थानं
यमुना-तीरम् अव्रजत्
 
 
अनुवाद
वह एक घने, अंधेरे जंगल में घुस गया जहाँ उसे कोई दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन उसने उस जगह को पहचान लिया जहाँ से आवाज़ आ रही थी, और वह उत्सुकता से वहाँ, यमुना के किनारे चला गया।
 
He entered a dense, dark forest where he could see no one. But he recognized the place where the sound was coming from, and he eagerly went there, to the banks of the Yamuna.
तात्पर्य
जंगल इतना घना था कि पेड़ की पत्तियों ने सूरज की रोशनी को प्रवेश करने की गुंजाइश नहीं छोड़ी थी। ब्राह्मण ने कोई को नहीं देखा था पर फिर भी नाम-संकीर्तन की ध्वनि सुनाई दे रही थी जिसने उसे आगे की ओर खींचा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)