श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  2.1.88 
तस्मिन् गो-भूषिते ’पश्यन्
कम् अपीतस् ततो भ्रमन्
केशी-तीर्थस्य पूर्वस्यां
दिशि शुश्राव रोदनम्
 
 
अनुवाद
वह उस गौ-सुशोभित भूमि में इधर-उधर भटकता रहा, किसी से मिला नहीं। लेकिन केशी-तीर्थ के पूर्व दिशा में एक स्थान पर उसने किसी के रोने की आवाज़ सुनी।
 
He wandered about in that cow-adorned land, encountering no one. But at a spot east of Keshi Tirtha, he heard someone crying.
तात्पर्य
जहाँ पवित्र स्थल पर कृष्ण ने एक बार घोड़े जैसे राक्षस, केशी को मारा था, वहाँ ब्राह्मण ने पहले मानव से मुलाकात की थी जिसका सामना उसे वृंदावन में करना था। यह पवित्र स्थल केशी-तीर्थ का वर्णन वराह पुराण (152.30-31) के मथुरा-माहात्म्य में किया गया है:

गंगा शत-गुणा प्रोक्ता

माथुरे मम मण्डले

यमुना विश्रुता देवी

नात्र कार्यया विचारणा

तस्याः शत-गुणा प्रोक्ता

यत्र केशी निपाटितः

केश्याः शत-गुणा प्रोक्ता

यत्र विश्रमितो हरिः

"हे पृथ्वी देवी, मेरा निवास मथुरा मेरी अपनी भूमि है, जहाँ यमुना गंगा से सौ गुना ज्यादा पवित्र है। इस पर किसी को संदेह करने की ज़रूरत नहीं। मथुरा से सौ गुना ज्यादा पवित्र यमुना का वह स्थान है जहाँ केशी राक्षस गिरा था, और केशी-तीर्थ से सौ गुना ज्यादा पवित्र वह पास की जगह है जहाँ राक्षस के मारे जाने के बाद कृष्ण ने विश्राम किया था।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)