श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.1.81 
उपद्रवो ’यं को मे ’नु-
जातो विघ्नो महान् किल
न समाप्तो जपो मे ’द्य-
तनो रात्रीयम् आगता
 
 
अनुवाद
"इस उपद्रव का कारण क्या है? अब मैं बड़ी मुसीबत में हूँ! आज का जप पूरा होने से पहले ही रात हो गई।"
 
"What's causing this commotion? I'm in big trouble now! It's night before I've even finished today's chanting."
तात्पर्य
वह रात उनके मंत्र जपने से पहले ही आ गई जो एक उपद्रव या पीड़ा का कारण था, साथ ही एक विघ्न भी था जो प्रतिदिन एक निर्धारित संख्या में मंत्रों के जप के उनके व्रत को पूरा करने में बाधा डाल रहा था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)