श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  2.1.76 
मन्ये ’थापि मदीयो ’यं
न भवेज् जगद्-ईश्वरः
नास्ति तल्-लक्षणं माघ-
माहात्म्यादौ श्रुतं हि यत्
 
 
अनुवाद
"फिर भी, मैं यह कल्पना नहीं कर सकता कि मेरे देवता ब्रह्मांड के स्वामी हैं। मेरे देवता में वे विशेषताएँ नहीं हैं जिनका वर्णन मैंने 'माघ मास की महिमा' और अन्य धर्मग्रंथों में सुना है।
 
“Yet, I cannot imagine that my deity is the Lord of the universe. My deity does not possess the characteristics I have heard described in ‘The Glory of the Month of Magha’ and other scriptures.
तात्पर्य
पदम पुराण के माघ-माहात्म्य के देवायुति कथा में प्रयाग के माधव भगवान का उल्लेख मिलता है। (उत्तर-खंड 128.202, 129.44):

तं दृष्ट्वा गरूडारूढं

प्रत्यग्र-जलद-छविम्

चतुर्बाहुं विशालाक्षं

सर्वांलंकारभूषितम्

"उन्हें गरुड़ पर विराजमान भगवान नजर आए। भगवान की आभा नए बादल की तरह थी। उनके चार हाथ और बड़ी-बड़ी आंखें थीं और वे सभी तरह के आभूषण पहने हुए थे।"

ब्रह्मादयाः सुराः सर्वे

योगिनः सनकादयः

त्वां साक्षात्-कर्तुमिच्छंति

सिद्धाश्च कपिलादयः

"ब्रह्मा के नेतृत्व में सभी देवता, सनका के नेतृत्व में सभी योगी और कपिल के नेतृत्व में सभी सिद्ध पुरुष आपको साक्षात देखना चाहते हैं।"

वर्तमान कविता कहती है कि ब्राह्मण ने माघ-माहात्म्यादौ, "माघ-माहात्म्य और अन्य ग्रंथों" से सुना। उन अन्य ग्रंथों में श्री स्कंद पुराण का वह भाग शामिल हो सकता है जो प्रयाग-तीर्थ का महिमामंडन करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)