श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.1.65 
श्री-वैष्णवा ऊचुः
सदा सर्वत्र वसति
बहिश् चान्तश् च स प्रभुः
कश्चिन् न सदृशस् तेन
कथञ्चिद् विद्यते क्वचित्
 
 
अनुवाद
पवित्र वैष्णवों ने कहा: वे परम गुरु हैं, और वे सदैव सर्वत्र, भीतर-बाहर, निवास करते हैं। कहीं भी कोई भी किसी भी दृष्टि से उनकी तुलना नहीं कर सकता।
 
The pious Vaishnavas said: He is the Supreme Guru, and He always resides everywhere, within and without. No one anywhere can compare to Him in any respect.
तात्पर्य
भौतिक संसार में, सभी चीज़ों की समय, स्थान और पदार्थ में सीमाएँ हैं। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के विशिष्ट शरीर की केवल एक निश्चित जीवन सीमा होती है। उससे पहले और बाद में, वह उस शरीर से अनुपस्थित है। उसका शारीरिक अस्तित्व ब्रह्मांड में एक छोटा सा स्थान घेरता है; वह एक जगह से दूसरी जगह भ्रमण कर सकता है, लेकिन केवल सख्त सीमाओं के भीतर। और उसकी पहचान किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु से अलग है। हालाँकि, भगवान विष्णु इन या अन्य तरीकों से सीमित होने वाले एक सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। वह सभी समय और स्थान पर व्याप्त है, और अन्य सभी व्यक्तिगत व्यक्ति और चीज़ें भी उनके ही अंग हैं। यह इस प्रश्न का उत्तर है कि "वह कहाँ रहता है?" प्रश्न के उत्तर में, "वह कैसे हैं?" वैष्णव कहते हैं कि वह अद्वितीय और अतुलनीय हैं। न तो इस भौतिक दुनिया में न ही इसके बाहर किसी की सुंदरता या अन्य व्यक्तिगत गुण उनकी बराबरी करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)