श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.1.51 
तन्-महा-रम्यताकृष्टः
परमानन्द-गोचरः
तज्-जपान्य-प्रवृत्तौ हि
न लेभे स मनो-बलम्
 
 
अनुवाद
श्रीगोपाल के आकर्षण ने उन्हें आकर्षित किया और उन्हें परमानंद प्रदान किया। इसके बाद उनमें मंत्र जप के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य में संलग्न होने की मानसिक शक्ति नहीं रही।
 
The charisma of Shri Gopal captivated him and brought him into ecstasy. After this, he no longer had the mental strength to engage in anything other than chanting mantras.
तात्पर्य
संन्यास या मुक्ति के लिए अब उसे कोई उत्साह नहीं रहा था और पवित्र स्नान व अन्य अनुष्ठान के बारे में तो कहना ही क्या।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)