श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.1.50 
स्व-जप्यं गौरवाद् देव्यास्
तथान्तः-सुख-लाभतः
अत्यजन्न् एकदा स्वप्ने
’पश्यत् तन्-मन्त्र-देवताम्
 
 
अनुवाद
फिर भी, देवी के प्रति श्रद्धा और इससे उन्हें आंतरिक आनंद मिलने के कारण, उन्होंने अपना मंत्र जपना नहीं छोड़ा। और एक दिन उन्हें स्वप्न में अपने मंत्र के देवता के दर्शन हुए।
 
Nevertheless, out of devotion to the Goddess and the inner joy it brought him, he continued chanting his mantra. One day, he had a vision of the deity of his mantra in a dream.
तात्पर्य
काशि में अपने द्वारा सुने गए निर्वैयक्तिक प्रचार से प्राग्ज्योतिष-पुरा ब्राह्मण का आस्था कमजोर हो गई थी जिसके कारण ब्रह्मांड के स्वामी से मिलने की उसकी आशा एकता में विलीन होने की झूठी उम्मीद से बदल गई थी। फिर भी, वह अपने मंत्र-जाप के साथ चला गया क्योंकि वह देवी कामख्या का बहुत सम्मान करता था और उसके आदेश का उल्लंघन करने को तैयार नहीं था। मंत्र में उसकी कमजोर आस्था के बावजूद, यह अपना अलौकिक प्रभाव डालता रहा। उसका हृदय वेदांत ग्रंथों के वादों से कोई पर्याप्त संतुष्टि प्राप्त नहीं कर सका, क्योंकि वह सहज ही भगवान गोपाल के मंत्र का जप करने में अधिक संतुष्टि महसूस करता था। शायद ब्राह्मण का मोक्ष के प्रति आकर्षण कभी भी दूर नहीं हो पाता अगर उसके मंत्र के देवता श्री गोपाल उसके स्वप्न में स्वयं प्रकट नहीं होते। या शायद मोक्ष की उसकी आशा वैसे भी मंत्र की शक्ति से खत्म हो जाती। किसी भी मामले में, उसका हृदय बदल गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)