प्रागज्योतिष-पुर के ब्राह्मण ने गंगा-सागर के स्थानीय ब्राह्मणों को धर्म के सिद्धांतों की इस प्रकार महिमा करते हुए सुना होगा:
आचार-प्रभवो धर्मो
धर्मस्य प्रभुः अच्युतः
"धर्म उचित व्यवहार से उत्पन्न होता है, और धर्म का स्वामी अचूक भगवान है।"
सदाचारवता पुंसा
जितौ लोकौ उभावपि
"जिस व्यक्ति में अच्छा व्यवहार होता है उसने इस दुनिया और अगली दोनों को जीत लिया है।"
स्थानीय ब्राह्मणों ने स्वर्ग को भी धर्म के फल के रूप में ऐसे शब्दों से महिमामंडित किया होगा:
यन न दुःखेन संभिन्नं
न च ग्रस्तम अनन्तरम्
अभिलाषोपनीतं च
सुखं तत् स्वर्
"स्वर्ग के निवासियों की खुशी अदूषित होती है, कभी भी दुख में नहीं डूबती है, और यह उसी तरह से आती है जिसकी वे इच्छा करते हैं।" (गदाधर भट्ट का वाडार्थ)
