श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.1.42 
तैर् वर्ण्यमानम् आचारं
नित्य-नैमित्तिकादिकम्
आवश्यकं तथा काम्यं
स्वर्गं शुश्राव तत्-फलम्
 
 
अनुवाद
उन्होंने उनसे नियमित और कभी-कभार किए जाने वाले कर्तव्यों, विशेष इच्छाओं के लिए किए जाने वाले वैकल्पिक कर्तव्यों और इन कार्यों के फल - स्वर्ग की प्राप्ति - का वर्णन सुना।
 
He heard them describe the regular and occasional duties to be performed, the optional duties to be performed for special desires, and the fruit of these actions—the attainment of heaven.
तात्पर्य
वैदिक अनुष्ठानों से दीक्षित ब्राह्मणों से कर्तव्य के रूप में नियमित रूप से कुछ यज्ञ करने की अपेक्षा की जाती है, जैसे अग्निहोत्र यज्ञ, जो प्रतिदिन दो बार, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय अवश्य किया जाना चाहिए। ऐसे ब्राह्मणों को अपने जीवन की विशेष परिस्थितियों के कारण अन्य अनुष्ठान भी करने पड़ सकते हैं, उदाहरण के लिए, जब उन्हें किसी बड़े के निधन की वर्षगांठ पर श्राद्ध स्मृति करना होता है। इन अनिवार्य नित्य और नैमित्तिक कर्तव्यों के अलावा, एक ब्राह्मण अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए काम्य अनुष्ठान कहलाने वाले कुछ यज्ञ और व्रत करने का भी चुनाव कर सकते हैं। इस प्रकार वैदिक ब्राह्मणों के लिए तीन प्रकार के कर्तव्य होते हैं।

प्रागज्योतिष-पुर के ब्राह्मण ने गंगा-सागर के स्थानीय ब्राह्मणों को धर्म के सिद्धांतों की इस प्रकार महिमा करते हुए सुना होगा:

आचार-प्रभवो धर्मो

धर्मस्य प्रभुः अच्युतः

"धर्म उचित व्यवहार से उत्पन्न होता है, और धर्म का स्वामी अचूक भगवान है।"

सदाचारवता पुंसा

जितौ लोकौ उभावपि

"जिस व्यक्ति में अच्छा व्यवहार होता है उसने इस दुनिया और अगली दोनों को जीत लिया है।"

स्थानीय ब्राह्मणों ने स्वर्ग को भी धर्म के फल के रूप में ऐसे शब्दों से महिमामंडित किया होगा:

यन न दुःखेन संभिन्नं

न च ग्रस्तम अनन्तरम्

अभिलाषोपनीतं च

सुखं तत् स्वर्

"स्वर्ग के निवासियों की खुशी अदूषित होती है, कभी भी दुख में नहीं डूबती है, और यह उसी तरह से आती है जिसकी वे इच्छा करते हैं।" (गदाधर भट्ट का वाडार्थ)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)