श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.1.38 
देव्य्-आदेशेन तं मन्त्रं
विविक्ते सततं जपन्
धनेच्छाया निवृत्तो ’भूल्
लेभे च हृदि निर्वृतिम्
 
 
अनुवाद
देवी के आदेश पर वह एकांत स्थान में निरंतर मन ही मन मंत्र का जाप करने लगा। धीरे-धीरे उसकी धन-संपत्ति की इच्छा समाप्त हो गई और उसका हृदय संतुष्ट हो गया।
 
At the Goddess's command, he began to chant the mantra silently in a secluded place. Gradually, his desire for wealth vanished, and his heart was satisfied.
तात्पर्य
ब्राह्मण इतना मूर्ख था कि उसने देवी की सलाह को नज़रअंदाज कर दिया और मंत्र को एक स्वप्न की झूठी रचना के रूप में खारिज कर दिया। उसने फिर उसे दूसरी बार स्वप्न में उसके निर्देशों को दोहराने के लिए दर्शन दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)