vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री बृहत् भागवतामृत
»
खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
»
अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)
»
श्लोक 35
श्लोक
2.1.35
विप्रो निष्किञ्चनः कश्चित्
पुरा प्राग्ज्योतिषे पुरे
वसन्न् अज्ञात-शास्त्रार्थो
बहु-द्रविण-काम्यया
अनुवाद
बहुत समय पहले प्राग्ज्योतिष नगरी में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह शास्त्रों से अनभिज्ञ था और धन-संपत्ति का लोभी था।
Long ago, in the town of Pragjyotish, there lived a poor Brahmin. He was ignorant of the scriptures and greedy for wealth.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×