श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.1.31 
मुनीन्द्र-गोष्ठ्याम् उपदेश्य तत्त्वं
शुकात्मना येन भयं निरस्य
प्रमोद्य च स्व-प्रिय-सङ्ग-दानात्
कथामृतं सम्प्रति च प्रपाय्ये
 
 
अनुवाद
भगवान ने श्रेष्ठ मुनियों की सभा में शुकदेव के माध्यम से सत्य का वर्णन करके मेरा भय दूर किया। और भगवान ने मुझे अपने प्रिय भक्तों का संग प्रदान करके प्रसन्न किया। अब मैं तुम्हें भगवान के विषय में अमृत का पान कराऊँगा।
 
The Lord dispelled my fear by describing the truth through Shukadeva in the assembly of great sages. And the Lord pleased me by giving me the company of His beloved devotees. Now I will give you the nectar of knowledge about the Lord.
तात्पर्य
वसिष्ठ, पराशर, व्यास और नारद जैसे अनेक महान ऋषि परीक्षित के निधन के साक्षी बने। "गोष्ठ्याम्" शब्द, जिसका कभी-कभी अर्थ "एक चर्चा में" होता है, यह संकेत देता है कि पहले ऋषियों के बीच कुछ बहस हुई थी, जैसा कि श्री हरि-भक्ति-सुधोदय में वर्णित है:

तेन ते देवता-तत्त्वं

पृष्टा वादान् वितेनरे

नाना-शास्त्र-विदो विप्रा

मिथः साधन-दूषणैः

हरिर्दैवं शिवो दैवं

भास्करो दैवम इत्युता

काल एव स्वभावस्तु

कर्मैवेति पृथग जगूः

"परमेश्वर के बारे में सच्चाई पूछे जाने पर, ऋषि, जो कई शास्त्रों के विशेषज्ञ थे, ने कई अलग-अलग सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। प्रत्येक ऋषि ने आध्यात्मिक अभ्यास के लिए दूसरों द्वारा अनुशंसित वैधता का खंडन करने की कोशिश की। उन्होंने विभिन्न विरोधी दावे किए: 'हरि परम भगवान हैं।' 'शिव परम भगवान हैं।' 'सूर्य परम भगवान हैं।' 'समय परम है।' 'मनुष्य का स्वभाव परम है।' 'कर्म परम है।"

"गोष्ठ्याम्" शब्द का अर्थ "एक सभा में" भी हो सकता है। उस तरह से लिया गया, यह इंगित करता है कि शुकदेव ने परीक्षित को जो बताया वह अकाट्य रूप से आधिकारिक था क्योंकि ब्रह्मांड के महानतम ऋषियों ने सर्वसम्मति से इसे स्वीकार किया था। शुकदेव के आगमन के साथ ही दार्शनिक मतभेद समाप्त हो गए। व्यास के पुत्र शुकदेव के माध्यम से, कृष्ण ने स्वयं परीक्षित को श्रीमद्-भागवतम् के आवश्यक आध्यात्मिक निर्देश प्रदान किए। शुकदेव ने दो तरह से परीक्षित को ज्ञान दिया। शरीर और आत्मा की तथ्यात्मक प्रकृति को समझाकर, उन्होंने परीक्षित के भय को दूर किया - सांप-पक्षी तक्षक के काटने और जन्म और मृत्यु के चक्र का डर। और भगवद-भक्ति की महिमा जैसे दिव्य विषयों के बारे में सिखाकर, शुकदेव ने परीक्षित को आनंद से भर दिया।

जब तक परीक्षित ने इस श्लोक को अपनी माँ से कहा, तब तक उनके दिव्य आध्यात्मिक गुरु पहले ही चले गए थे, और मृत्यु का समय आ गया था। लेकिन कृष्ण ने परीक्षित को एक संत वैष्णव, अर्थात् अपनी माँ के साथ फिर से आशीर्वाद देकर पक्ष करना जारी रखा। इसलिए परीक्षित उनसे कहते हैं, "अब मुझे आपको हरि-कथामृत प्रदान करने दें, प्रभु के उत्कृष्ट अमृतमय विषय।" प्रभु के प्रिय भक्तों की संगति में हरि-कथामृत का पान कर पाना जीवन की सबसे वांछनीय उपलब्धि है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)