ध्रुवम् ततो मे कृत-देव-हेलनाद्
दुरत्ययं व्यसनं नाति-दीर्घात्
तद् अस्तु कामं ह्य् अघ-निष्कृतये मे
यथा ना कुर्यां पुनर एवम् अधा
“सर्वोच्च भगवान के आदेशों की उपेक्षा करने के कारण, मुझे निश्चित रूप से निकट भविष्य में कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। अब मैं दिल से कामना करता हूँ कि आपदा एक साथ ही मुझ पर सीधे आ जाए, क्योंकि इस तरह मैं पाप के प्रतिक्रिया से मुक्त हो सकता हूँ और दोबारा ऐसा अपराध नहीं करूँगा।” वह चाहता था कि प्रतिक्रिया तुरंत और बिना किसी देरी (नाति-दीर्घात्) आ जाए। और वह चाहता था कि सज़ा सीधे उसी पर पड़े (अधा), न कि उसके किसी बेटे या किसी और पर।
यहाँ परीक्षित अपने पारिवारिक जीवन को एक अंध कुआँ कहता है, एक ऐसा कुआँ जिससे वह खुद को ऊपर नहीं उठा सकता था। श्री कृष्ण ने बड़ी कृपा से उसे उस कुएँ से बाहर निकाला और उसे गंगा नदी के तट पर लाया। चेतना के नियंत्रक भगवान, वासुदेव के रूप में कृष्ण ने परीक्षित के मन को मृत्यु तक खाने-पीने से उपवास करने के विचार की ओर आकर्षित किया। क्योंकि भगवान ने खुद उसका नियंत्रण ले लिया था, इसलिए परीक्षित अपने महल में नहीं रहा और यज्ञ (बलिदान) और प्रायश्चित (पापपूर्ण कामों में गलती से फँसने का प्रायश्चित) करके शाप का प्रतिकार करने की कोशिश नहीं की।
कृष्ण वासुदेव हैं, सभी की परमात्मा और वह श्री वसुदेव के पुत्र हैं, जो परम करुणा और नम्रता के भंडार हैं। इसलिए कृष्ण के लिए यह स्वाभाविक था कि वे ऐसी परिस्थितियाँ बना कर अपने प्रिय भक्त परीक्षित पर कृपा करें।
