श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.1.30 
तच्-छिष्य-रूपेण च मत्-प्रियं तं
संश्राव्य शापं निलयान्ध-कूपात्
श्री-वासुदेवेन विकृष्य नीतः
प्रायोपवेशाय मतिं द्यु-नद्याम्
 
 
अनुवाद
जब मैंने उस श्राप के बारे में सुना, तो मैंने उसे अत्यंत स्वागत योग्य समझा। श्री वासुदेव, एक ब्राह्मण के शिष्य के रूप में, मुझे पारिवारिक जीवन के अंधे कुएँ से बाहर खींच रहे थे और मुझे दिव्य गंगा के तट पर मृत्युपर्यन्त उपवास करने का मार्ग दिखा रहे थे।
 
When I heard about that curse, I found it most welcome. Sri Vasudeva, as a disciple of a Brahmin, was pulling me out of the dark well of family life and showing me the path to fasting until death on the banks of the divine Ganges.
तात्पर्य
किस्मत के एक और खेल से, किसी ने परीक्षित को खबर दी कि उसे सात दिनों में मौत मरनी है। अगर परीक्षित इस खबर से अनजान रहता, तो वह कभी भी गंगा के किनारे जा कर मृत्यु के लिए उपवास नहीं करता। हालाँकि परीक्षित ने ब्राह्मण के शाप को काव्यात्मक ढंग से डर का कारण बताया है, सच्चाई यह है कि जब परीक्षित ने शाप के बारे में सुना तो वह निडर था और खुश भी था। वह अपने अपराध पर ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रहा था। इसलिए उसने यहाँ कहा, मत-प्रीयं तम: "मैंने इसे दिल से स्वागत किया।" श्रीमद भागवतम के पहले कांड के आखिरी अध्याय (1.19.2) में, शाप के बारे में सुनने से पहले ही, परीक्षित ने अपने मन की बात व्यक्त की:

ध्रुवम् ततो मे कृत-देव-हेलनाद्

दुरत्ययं व्यसनं नाति-दीर्घात्

तद् अस्तु कामं ह्य् अघ-निष्कृतये मे

यथा ना कुर्यां पुनर एवम् अधा

“सर्वोच्च भगवान के आदेशों की उपेक्षा करने के कारण, मुझे निश्चित रूप से निकट भविष्य में कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। अब मैं दिल से कामना करता हूँ कि आपदा एक साथ ही मुझ पर सीधे आ जाए, क्योंकि इस तरह मैं पाप के प्रतिक्रिया से मुक्त हो सकता हूँ और दोबारा ऐसा अपराध नहीं करूँगा।” वह चाहता था कि प्रतिक्रिया तुरंत और बिना किसी देरी (नाति-दीर्घात्) आ जाए। और वह चाहता था कि सज़ा सीधे उसी पर पड़े (अधा), न कि उसके किसी बेटे या किसी और पर।

यहाँ परीक्षित अपने पारिवारिक जीवन को एक अंध कुआँ कहता है, एक ऐसा कुआँ जिससे वह खुद को ऊपर नहीं उठा सकता था। श्री कृष्ण ने बड़ी कृपा से उसे उस कुएँ से बाहर निकाला और उसे गंगा नदी के तट पर लाया। चेतना के नियंत्रक भगवान, वासुदेव के रूप में कृष्ण ने परीक्षित के मन को मृत्यु तक खाने-पीने से उपवास करने के विचार की ओर आकर्षित किया। क्योंकि भगवान ने खुद उसका नियंत्रण ले लिया था, इसलिए परीक्षित अपने महल में नहीं रहा और यज्ञ (बलिदान) और प्रायश्चित (पापपूर्ण कामों में गलती से फँसने का प्रायश्चित) करके शाप का प्रतिकार करने की कोशिश नहीं की।

कृष्ण वासुदेव हैं, सभी की परमात्मा और वह श्री वसुदेव के पुत्र हैं, जो परम करुणा और नम्रता के भंडार हैं। इसलिए कृष्ण के लिए यह स्वाभाविक था कि वे ऐसी परिस्थितियाँ बना कर अपने प्रिय भक्त परीक्षित पर कृपा करें।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)