श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.1.27 
निज-प्रिय-सखस्यात्र
श्री-सुभद्रा-पतेर् अहम्
येन पौत्रतया गर्भे
तव सज्-जन्म लम्भितः
 
 
अनुवाद
स्वयं कृष्ण ने मुझे आपके गर्भ से, अपने प्रिय मित्र, श्री सुभद्रा के पति अर्जुन के पौत्र के रूप में, यहाँ जन्म लेने का सौभाग्य प्रदान किया है।
 
Krishna himself has blessed me with the good fortune of being born here from your womb, as the grandson of Arjuna, the husband of his dear friend, Sri Subhadra.
तात्पर्य
परिचित को एहसास हुआ कि केवल श्री कृष्ण की विशेष कृपा से ही वे अपनी माँ के प्रश्न का उत्तर दे पाएँगे, तदनुसार वे कृष्ण को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 27 से 31 तक के ग्रंथों में वे सबसे पहले उन उपकारों का वर्णन करते हैं जो कृष्ण ने उनके पूरे जीवन में दिखाए। इस श्लोक में "अत्र" ("यहाँ") शब्द के कई संबंधित अर्थ हैं: परीक्षित का जन्म भारत-वर्ष की पवित्र भूमि में, उसके सबसे पवित्र मध्य क्षेत्र में, मानव प्रजातियों में, महान क्षत्रियों के वंश में और कृष्ण के मित्र अर्जुन के पोते के रूप में। उत्तर का गर्भ। उनका जन्म सत् था, शुभ था, क्योंकि यह कृष्ण से जुड़ा था। कृष्ण ने परीक्षित के अजन्मे शरीर को अश्वत्थामा के हथियार से उत्परिवर्तन से बचाया था। और परीक्षित की दादी सुभद्रा थीं, कृष्ण की बहन, अर्जुन की कोई और पत्नी नहीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)