श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.1.26 
श्री-परीक्षिद् उवाच
श्री-कृष्ण-जीविते मातस्
तदीय-विरहासहे
तवैव योग्यः प्रश्नो ’यं
न कृतो यश् च कैश्चन
 
 
अनुवाद
श्री परीक्षित बोले: हे माता! तुम जो केवल श्रीकृष्ण के लिए ही जीवित रहती हो, उनके लिए उनका वियोग असह्य है। तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत प्रशंसनीय है। इससे पहले किसी ने यह प्रश्न नहीं पूछा।
 
Shri Parikshit said: O Mother! You, who live only for Shri Krishna, find his separation unbearable. Your question is highly commendable. No one has asked this question before.
तात्पर्य
परीक्षित अपनी माता को प्रोत्साहित करना चाहता है ताकि उसका मन आसानी से उस बात पर ध्यान केन्द्रित कर सके जिसे वह कहने वाला है। वह उसे श्री-कृष्ण-जीविता कहता है, जिसका अर्थ "वह जो केवल श्री कृष्ण के लिए रहता है" या "वह जिसे श्री कृष्ण ने पुनः जीवन दिया" होता है, दूसरा अर्थ कृष्ण के अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को रोककर उत्तरा के जीवन को बचाने पर इशारा करता है। उत्तरा को कृष्ण से अलग होने पर बहुत दुख सहने के लिए जाना जाता है। जैसा कि सूत गोस्वामी ने श्रीमद्-भागवतम (1.10.9-10) के प्रथम कैंटो में वर्णन किया है:

सुभद्रा द्रौपदी कुन्ती

विराट-तnaya तथैव,

गांधारी धृतराष्ट्रश्च

युयुत्सुर गौतमो यमौ,

वृकोदरश्च धौम्यश्च

स्त्रियो मत्स्य-सुतादयः

न शेहिरे विमुह्यन्तो

विरहं शार्ङ्ग-धन्वनः

"सुभद्रा, द्रौपदी, कुन्ती, उत्तरा और गांधारी, और धृतराष्ट्र, युयुत्सु, कृपाचार्य, और नकुल और सहदेव, और भीमसेन और धौम्य, और मत्स्य की बेटी जैसी महिलाएं सभी लगभग बेहोश हो गईं क्योंकि उनके लिए भगवान कृष्ण से अलग होना असंभव था।"

उत्तर के पिता, राजा विराट को उनकी बहन सत्यवती के साथ एक मछुआरे (मत्स्य) ने गोद लिया था। चूंकि विराट को मत्स्य भी कहा जाता था, इसलिए मत्स्य-सुता ("मछुआरे की बेटी") नाम या तो सत्यवती या उसकी भतीजी उत्तरा को इंगित कर सकता है। अगर हम इन दोनों विकल्पों में से दूसरा लेते हैं, तो उत्तरा का इन दो छंदों में दो बार उल्लेख किया गया है, जो दर्शाता है कि वह दूसरों की तुलना में भी अधिक तीव्रता से कृष्ण को विरह से तड़पती थी। इसलिए उनके लिए कृष्ण की भक्ति सेवा के बारे में इतने गोपनीय रूप से पूछना बिल्कुल उचित है। तवैव योग्यः प्रश्नः का अर्थ है "केवल प्रासंगिक प्रश्न तुम्हारा है (तव एव)।" ऐसे प्रश्न पूछने के लिए कुछ अन्य व्यक्तियों में उचित भक्ति भाव होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)