सदा दोलायमानात्मा
कथं तद् अनुतप्यसे
तत्रैव गच्छ काले मां
तद्-रूपं द्रक्ष्यसि ध्रुवम्
अनुवाद
"क्यों लगातार विलाप करते हो, एक निर्णय से दूसरे निर्णय के बीच झूलते हुए? बस मथुरा जाओ, और समय आने पर तुम मुझे अवश्य ही अपने इच्छित रूप में देखोगे।"
"Why do you constantly lament, vacillating between one decision and another? Just go to Mathura, and in time you will surely see me in the form you desire."
तात्पर्य
गोप-कुमार ने जो भगवान की मूर्ति ध्यान में धारण की है, वह श्री मदन-गोपाल-देव की है। जगन्नाथ भगवान गोप-कुमार को आश्वासन देते हैं, "तुम मुझे मथुरा-भूमि में उसी रूप में उचित समय पर देखोगे। उसके बाद, तुम्हें फिर कभी दुख या असंतोष नहीं होगा।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥