श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.1.217 
बाल्य-लीला-स्थलीभिश् च
ताभिस् ताभिर् अलङ्कृता
निवसामि यथात्राहं
तथा तत्रापि विभ्रमन्
 
 
अनुवाद
"मथुरा मेरी बाल लीलाओं के विविध स्थलों से सुशोभित है। जैसे मैं यहाँ पुरी में सर्वत्र विचरण करता हुआ सदैव निवास करता हूँ, वैसे ही मैं मथुरा में भी विचरण करता हूँ।
 
"Mathura is adorned with various places of My childhood pastimes. Just as I reside here in Puri, wandering everywhere, I also wander in Mathura.
तात्पर्य
मथुरा पुरुषोत्तम-क्षेत्र से भगवान के व्यक्तित्व को और भी प्रिय है क्योंकि मथुरा में उन्होंने अपने जन्म और बचपन के लीलाओं का प्रदर्शन किया। बचपन तकनीकी रूप से परिपक्वता से पहले के वर्षों होता है, जिन्हें तीन चरणों- कौनमार, पौगंड और कैशोरा में विभाजित किया जाता है। कई पवित्र वक्तव्य मानव जीवन को जन्म, यौवन और बुढ़ापे से गुजरने के रूप में वर्णित करते हैं। उदाहरण के लिए:

जनम बाल्यं तत सर

जंतुः प्राप्नोति यौवन

अन्याहतैव भवति

ततो 'नु-दिवसम जरा

"प्रत्येक प्राणी जन्म लेता है, फिर एक बच्चा, और फिर एक युवा। और यदि उसका जीवन समय से पहले बाधित नहीं होता है, तो वह प्रतिदिन बुढ़ापे की ओर पहुंचता है।"

गोपा-कुमार आपत्ति कर सकता है कि यहां पुरी में भगवान दिखाई देते हैं जबकि मथुरा में नहीं। लेकिन भगवान जगन्नाथ यहां जवाब देते हैं कि वह निश्चित रूप से मथुरा में रहते हैं, अपने भक्तों के साथ घूमते हैं और आनंद लेते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)