श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  2.1.210 
राज्ञो ’पत्येष्व् अमात्येषु
बन्धुष्व् अपि समर्प्य तम्
राज्य-भारं स्वयं प्राग्-वद्
उदासीनतया स्थितः
 
 
अनुवाद
इसलिए मैंने राज्य का भार पिछले राजा के पुत्रों, मंत्रियों और रिश्तेदारों को सौंप दिया और पहले की तरह मैं अलग-थलग और अलग-थलग हो गया।
 
So I handed over the responsibility of the kingdom to the sons, ministers and relatives of the previous king and became isolated and aloof as before.
तात्पर्य
अंततः उन्होंने सिंहासन त्याग दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)