श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 203
 
 
श्लोक  2.1.203 
यदा वा लीलया स्थाणु-
भावं भजति कौतुकी
प्रीणन्त्य् अथापि साश्चर्यास्
ते तल्-लीलानुसारिणः
 
 
अनुवाद
अथवा जब चंचल भगवान जगन्नाथ अपनी लीला के रूप में स्थिर खड़े थे, तब भी उनके निकटतम भक्त उनके अंतरंग भाव में समर्पित हो गए, उनकी महानता पर आश्चर्यचकित हो गए और प्रेम में आनंदित हो गए।
 
Or even when the playful Lord Jagannatha stood still in His Leela form, His closest devotees surrendered to Him intimately, marveled at His greatness and rejoiced in love.
तात्पर्य
ओडिशा के पजारी की एकान्त साहचर्य में, भगवान जगन्नाथ कभी-कभी बातें करते थे और विभिन्न व्यक्तिगत आदान-प्रदान में संलग्न होते थे। लेकिन वेदिका पर गतिहीन और मौन रहने पर भी, उन सबसे अंतरंग भक्तों का उनसे बहुत ही विशेष संबंध था। भगवान निर्जीव लट्ठा नहीं हैं; वे केवल ऐसा होने का ढोंग करते हैं। हर मौका मिलते ही वे अपने भक्तों के साथ हर प्रकार के खेल और चालों में लिप्त हो जाते हैं। यह देखकर पुजारी आश्चर्यचकित रह जाते थे कि कैसे भगवान जगन्नाथ एक पल में एक शरारती बच्चे की तरह काम करते हैं और अगले पल स्थिर देवता के रूप में प्रकट होते हैं। परंतु जब जगन्नाथ क्रियाशील नहीं होते थे और उनसे बात नहीं करते थे, तब पुजारी उदास होने के बजाय, उस समय भगवान जो भी लीला कर रहे थे, उसमें शामिल होकर खुश होते थे, चाहे वह सक्रिय हो या निष्क्रिय।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)