श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.1.20 
परां काष्ठां गतं तत्-तद्-
रस-जातीयतोचितम्
अथापि रास-कृत्-तादृग्-
भक्तानाम् अस्तु का गतिः
 
 
अनुवाद
वे सभी भगवान के साथ अपने-अपने आनंदमय आदान-प्रदान में, सुख की चरम सीमा को प्राप्त कर चुके हैं। लेकिन रास नृत्य करने वाले के अनन्य भक्तों के लिए क्या स्थान नियत है?
 
They have all attained the pinnacle of bliss in their respective blissful exchanges with the Lord. But what place is destined for the exclusive devotees of the Raas dancer?
तात्पर्य
“ठीक है,” कोई पूछ सकता है, “अगर वैकुण्ठ में महान और श्रेष्ठ भक्तों का कोई पदानुक्रम है, तो उनमें से केवल कुछ ही पूर्ण रूप से खुश हैं। क्या यह उचित है? क्या सर्वोच्च भगवान के भक्त, विशेष रूप से जिन्होंने वैकुण्ठ प्राप्त कर लिया है, वे केवल मुक्त आत्माओं से महान नहीं हैं? क्या वे मुक्ति से ऊपर, सर्वोच्च सुख का आनंद नहीं लेते हैं?”

वर्तमान पद इस शंका को दूर करता है। वैकुण्ठ के सभी निवासी अतुलनीय सुख का आनंद लेते हैं, लेकिन सुख का कुछ श्रेणीबद्ध स्तर अभी भी मौजूद है क्योंकि प्रत्येक भक्त उत्साह के मिश्रण का आनंद लेता है जो उसके व्यक्तिगत भक्तिभाव या रस को बनाता है। इसलिए, यह स्वाभाविक है कि एक भक्त के स्थायी-भाव के अनुसार, उसके परमानंद रस की प्रमुख मनोदशा के अनुसार, वह एक विशेष स्तर और प्रकार की खुशी प्राप्त करता है। फिर भी, प्रत्येक भक्त सोचता है कि उसकी खुशी पूर्ण और संपूर्ण है, क्योंकि यह उसके व्यक्तित्व के बिल्कुल अनुकूल है।

इसे स्वीकार करने के बाद, माँ उत्तरा अगला अपनी शंका श्री कृष्ण के भक्तों को लेकर व्यक्त करती हैं, जिनका भगवान के लिए सहज प्रेम प्रेम की अन्य सभी किस्मों से बड़ा है। क्या वैकुण्ठ में कोई विशेष स्थान है जहाँ वे भक्त अपने लायक सर्वोच्च सुख का आनंद ले सकते हैं?

उत्तरा के प्रश्न में निम्नलिखित निहितार्थ हैं: शुद्ध-भक्त, सर्वोच्च भगवान की पूजा में, ज्ञान-भक्तों की तुलना में अधिक परमानंद का आनंद लेते हैं। लेकिन यद्यपि वैकुण्ठ में भक्त खुद को एक ऐसे पदानुक्रम में पाते हैं जो सामान्य रूप से ईर्ष्या, झगड़े और अन्य प्रकार के संघर्ष का कारण बनता है, वे भक्त ईर्ष्या और अन्य दोषों से मुक्त होते हैं, जो दुख और विलाप के मूल कारण हैं। इस पवित्रता के बिना वे वैकुण्ठ में निवास नहीं कर सकते थे। उदात्त प्रेम में एक-दूसरे से स्नेहपूर्वक जुड़े हुए, वे सभी भगवान की पूजा में लगातार बढ़ती हुई खुशी महसूस करते हैं।

जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है, शुद्ध-भक्त, जिनकी भगवान के प्रति भक्ति वैकुण्ठ में जीवन के आनंद पर निर्भर नहीं करती है, वे अधिक सशर्त ज्ञान-भक्तों से ऊपर हैं। ऐसा होने पर, इससे भी श्रेष्ठ भक्तों की स्थिति के बारे में क्या? भगवान के सर्वश्रेष्ठ सेवकों, प्रेम-भक्तों का क्या, जो सभी संभव स्वार्थी चिंताओं के प्रति उदासीन हैं? भगवान के सर्वोच्च मित्रों, प्रेम-पर-भक्तों का क्या, जो उनका बिना शर्त विशेष अनुग्रह प्राप्त करते हैं? और उनके सबसे करीबी प्रेमियों, प्रेमतुरा-भक्तों का क्या, जो भगवान के साथ सबसे अंतरंग संबंधों से बंधे हैं और जो केवल उनकी संतुष्टि के लिए जीते हैं? उन अतिउत्कृष्ट भक्तों के लिए वैकुण्ठ में क्या विशेष स्थान मिल सकता है?

स्कंद पुराण बताता है कि वैकुण्ठ में असाधारण क्षेत्र मौजूद हैं। वैकुण्ठ में अयोध्या और द्वारका जैसे पारलौकिक शहर हैं, जो पृथ्वी पर अपने समकक्षों की तरह, सर्वोच्च भगवान के व्यक्तिगत सहयोगियों और सामग्री से भरे हुए हैं। उन सर्वोच्च स्थानों में भगवान हमेशा अपने सबसे आकर्षक रूप में उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार, उदाहरण के लिए, वैकुण्ठ के अयोध्या क्षेत्र में हनुमान के स्तर के भक्त लगातार रघुओं के भगवान, भगवान रामचंद्र को देखते हैं, जो श्री सीता, लक्ष्मण और उनके बाकी सहयोगियों से घिरे हुए हैं। वे भक्त अपने सेवक होने के सुख का आनंद लेते रहते हैं, जैसा कि उन्होंने पृथ्वी पर अपने लीलाओं के दौरान भगवान के साथ उपस्थित रहते हुए किया था, और उनकी महत्वाकांक्षाएं हर संभव तरीके से पूरी होती हैं। इसी तरह, वैकुण्ठ के द्वारका में श्री युधिष्ठिर और उनके परिवार जैसे भक्त कृष्ण की पूजा देवकी के प्रिय पुत्र, अर्जुन के मित्र, बलराम के छोटे भाई, रुक्मिणी और सत्यभामा के प्रिय के रूप में करते हैं। पांडव अपने अवतार के दौरान कृष्ण की तरह ही अपने घरों में उनकी सेवा करते रहते हैं। और द्वारका में भी उद्धव जैसी ऊँची आत्माओं वाले यादव कृष्ण की पूजा करते हैं और उन्हें अपने स्वामी के रूप में सेवा करते हैं, उन्हें अपने धन, अपनी शक्ति और अपने जीवन से भी अधिक मूल्यवान मानते हैं। शुद्ध प्रेम के अंतहीन कई रूपांतरणों में, यादव, उनकी आंतरिक और बाहरी चेतना आनंद से ओतप्रोत, उतनी ही खुशी का आनंद लेते हैं जितनी वे चाहते हैं।

वैकुण्ठ में ये भक्त उसी तरह जीवन का आनंद लेते हैं जैसे उन्होंने अपने सबसे प्रिय भगवान के साथ पृथ्वी पर उपस्थित रहते हुए किया था, जहाँ उन्होंने उनके चरण कमलों की सेवा करने, उनकी दया प्राप्त करने, उनके लिए शुद्ध प्रेम का आनंद लेने और उनके लीलाओं में भागीदारी करने का सर्वोच्च सौभाग्य प्राप्त किया था। सर्वोच्च भगवान के सांसारिक और वैकुण्ठ लीलाओं में ये विशेषताएं समान हैं, आध्यात्मिक दुनिया की महानता को कम नहीं करती हैं, क्योंकि भौतिक या आध्यात्मिक दुनिया में, भगवान के सभी भक्त उनकी अनंत करुणा की वस्तु हैं। भले ही भक्त उच्च और निम्न पदों पर हों, अंतर भगवान के शुद्ध प्रेम के अविश्वसनीय रूप से वांछनीय, भारी उत्साह के पीछे पीला पड़ जाता है।

फिर भी, हमें भक्ति सेवा की किस्मों में एक स्वाभाविक पदानुक्रम को पहचानना चाहिए। क्योंकि ज्ञान-भक्तों के पास ज्ञान के प्रति कुछ लगाव होता है, प्रेम के शुद्ध उत्साह उनके दिलों में विकसित नहीं होते हैं, भले ही वे वैकुण्ठ में रहते हों। उन्हें जो पारलौकिक सुख मिलना चाहिए वह ज्यादातर उनकी मानसिक गतिविधियों तक ही सीमित है। शुद्ध-भक्त अधिक सुख का आनंद लेते हैं, जो भगवान के बारे में सुनने और जप करने, उन्हें याद करने आदि के माध्यम से उनकी सभी इंद्रियों को जीवंत करता है। और प्रेम-भक्त अपनी सभी आंतरिक और बाहरी इंद्रियों के माध्यम से और भी अधिक सुख का अनुभव करते हैं, क्योंकि भगवान को देखते हुए और विभिन्न तरीकों से उनकी सेवा करते हुए वे लगातार प्रेम से उनका ध्यान करते हैं। प्रेम-पर-भक्त अभी भी खुशी के एक उच्च स्तर को संजोते हैं, जिसका स्वाद वे भगवान के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार में, स्वतंत्र रूप से उनके साथ बात करने में और अलगाव और मिलने के अपने तीव्र मनोदशा में लेते हैं। वह पारलौकिक आनंद उनके पूरे अस्तित्व को भर देता है। और प्रेमतुरा-भक्त खुशी के अंतिम चरम को जानते हैं; वे भगवान को देखने, उनके साथ लीलाओं को साझा करने और उनके साथ अनगिनत अंतरंग व्यवहारों का आदान-प्रदान करने की अविरल और सबसे तीव्र प्रेमपूर्ण अपेक्षा में डूबे रहते हैं। उनके अस्तित्व का प्रत्येक तंतु ऐसे आनंद से भरा हुआ है, जो हमेशा उनकी सबसे बड़ी अपेक्षाओं से अधिक होता है।

इसलिए, चूंकि साधना के विभिन्न स्तर पूर्णता के विभिन्न स्तर लाते हैं, यह निर्विवाद है कि वैकुण्ठ में, जहां खुशी अपनी अंतिम सीमा तक पहुंचती है, कुछ भक्त अधिक खुशी का आनंद लेते हैं और कुछ कम। और अंतिम अंक में, जो लोग भगवान की भक्ति सेवा की उच्चतम पद्धति का अभ्यास करते हैं, वे पूर्णता के अंतिम चरम को प्राप्त करते हैं, परमानंद केवल वे ही जानते हैं जिनका प्रेम विशेष रूप से गोपियों के दिव्य प्रेमी के चरण कमलों पर केंद्रित होता है। इसके सापेक्ष अन्य सभी भक्तों की स्थिति हीन है। वैकुंठ, आध्यात्मिक साम्राज्य की प्रकृति ऐसी है कि प्रत्येक भक्त, उसकी भक्ति की भावना की परवाह किए बिना, महसूस करता है कि भगवान के साथ अपने रिश्ते में अपने दिल की प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में उसे जो खुशी मिलती है वह अद्वितीय है। फिर भी, उत्तरा जानना चाहती है कि भगवान के सबसे असाधारण भक्तों, जो श्री नंद-किशोर के चरण कमलों के प्रति सहज प्रेम से भरे हुए हैं, को कौन सी विशेष मंजिल का इंतजार है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)