श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 192
 
 
श्लोक  2.1.192 
मां द्रक्ष्यसि कदाप्य् अत्र
वृन्दारण्ये कदाचन
एवं स माम् अनुज्ञाप्य
कुत्रापि सहसागमत्
 
 
अनुवाद
"कभी तुम मुझे यहाँ देखोगे, और कभी वृन्दावन में।" ऐसा आदेश देकर मेरे गुरु अचानक कहीं और चले गये।
 
"Sometimes you will see me here, and sometimes in Vrindavan." With this order, my Guru suddenly left somewhere else.
तात्पर्य
गोप कुमार ने अभी भी मंत्र जपने का पूरा निर्देश नहीं पाया है, मगर उनके गुरु के अनुसार अब तक वह जानकारी प्रकट करने के लिए समय और जगह मुनासिब नहीं है। बजाए इसके गुरु वादा करते हैं कि गोप कुमार फिर कई बार उनसे मिलेंगे। यदि गोप कुमार को उनकी साधना के बारे में पूरी जानकारी दे दी गई तो वह जल्द ही सिद्धि पा सकते हैं मगर जिस तरह भाग्य ने चाहा है उन्हें पहले ब्रह्मांड के चारों ओर कुछ भ्रमण करना होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)