श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.1.19 
तत्-प्रदेश-विशेषेषु
स्व-स्वभाव-विशेषतः
स्व-स्व-प्रिय-विशेषाप्त्या
सर्वेषाम् अस्तु वा सुखम्
 
 
अनुवाद
निस्सन्देह, वैकुण्ठ के प्रत्येक विशिष्ट क्षेत्र में सभी भक्त पूर्णतः प्रसन्न हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी विशिष्ट प्रकृति के अनुसार जो चाहा है, उसे प्राप्त कर लिया है।
 
Undoubtedly, all the devotees in each specific region of Vaikuntha are perfectly happy because they have obtained what they desired according to their specific nature.
तात्पर्य
ऐसा मानते हुए कि वैकुंठ के चुने हुए भागों में भक्त विशिष्ट भक्ति भावों के अनुसार विशेषाधिकारों का आनंद लेने में सक्षम हैं, तब भी इस बात पर संदेह बना रह सकता है कि प्रभु के सबसे गोपनीय भक्त कहाँ निवास करते हैं। वैकुण्ठ के दायरे में कुछ विशेष स्थान मौजूद हैं, जैसे कि अयोध्या और द्वारका, जहाँ शुद्ध भक्ति सेवा के अधिक अंतरंग रूप प्रकट होते हैं। पृथ्वी पर भगवान के प्रत्येक प्रतिकृति निवास के लिए वैकुंठ में एक मूल निवास है। जैसा कि धर्मग्रंथ में कहा गया है,

या यथा भुवि वर्तन्ते पुर्यो भगवतः प्रियाः

तास तथा सन्ति वैकुण्ठे तत्तल्-लीलार्थमादृताः

"इस पृथ्वी पर कई पवित्र नगर भगवान को प्रिय हैं, और वे सभी वैकुंठ में भी मौजूद हैं, जहाँ उन्हें भगवान के विभिन्न लीलाओं में उनके महत्व के लिए पूजा जाता है।"

मां उत्तर सत्ताईस लाख वैकुण्ठ के मुक्त भक्तों के पांचों प्रकार वैष्णवों-ज्ञान-भक्त, शुद्ध-भक्त, प्रेम-भक्त, प्रेम-पर-भक्त और प्रेमातुरा-भक्त का प्रतिनिधित्व करती हुई बोल रही हैं। हालाँकि, वास्तव में, वह बहुत अधिक विश्वास के बिना बोलती है, क्योंकि जहाँ तक उसकी समझ है, वैकुंठ के भक्त ऐसी श्रेणियों में विभाजित नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)