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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)
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श्लोक 187
श्लोक
2.1.187
इतस् ततो ’मृग्यतासौ
दिने ’न्यस्मिंस् तटे ’म्बुधेः
नाम-सङ्कीर्तनानन्दैर्
नृत्यल्+ लब्धो मयैकलः
अनुवाद
इधर-उधर खोजने के बाद, अगले दिन मैंने उन्हें समुद्र के किनारे अकेले नाम-संकीर्तन के आनंद में नाचते हुए पाया।
After searching here and there, the next day I found him alone on the seashore, dancing in the joy of chanting the name of the Lord.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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