श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 182
 
 
श्लोक  2.1.182 
अथ तस्यान्तरीणायां
सेवायां कर्हिचित् प्रभोः
जाता रुचिर् मे तापो ’पि
तस्या अघटनान् महान्
 
 
अनुवाद
फिर मुझे प्रभु की और भी ज़्यादा आत्मीयता से सेवा करने की इच्छा होने लगी। लेकिन यह इच्छा मुझे बहुत दुःख भी पहुँचाती थी क्योंकि यह पूरी नहीं हो पाती थी।
 
Then I began to desire to serve the Lord even more intimately. But this desire also caused me great pain because it remained unfulfilled.
तात्पर्य
जगन्नाथ पुरी में बसना स्वयं में आनंद का एक बड़ा स्रोत था, लेकिन गोप-कुमार भगवान जगन्नाथ की व्यक्तिगत सेवा करने का और भी अधिक आनंद उठाने के प्रति आकर्षित हो गये। यह आग्रह, पहले एक धुंधले असुविधा के रूप में महसूस किया गया, धीरे-धीरे एक जागरूक इच्छा बन गया। गोप-कुमार मंदिर के अंदरूनी कमरों में प्रवेश करना चाहते थे और भगवान के व्यक्तिगत परिचारकों में से एक के रूप में भगवान से संपर्क करना चाहते थे। कोई आश्चर्य कर सकता है कि क्या यह इच्छा अपने हाथ से चंद्रमा को छूने की इच्छा से अधिक व्यावहारिक नहीं थी, लेकिन गोप-कुमार भगवान जगन्नाथ को प्रभु के रूप में संदर्भित करते हैं जो यह दर्शाता है कि भगवान कुछ भी कर सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)