वैकुण्ठ की अनेक प्रकार की पूर्णताएँ एक ही बुनियादी सेवा के समान अभिव्यक्तियाँ हैं। उन पूर्णताओं में सारूप्य (भगवान की तरह चार भुजाओं और अन्य विशेषताओं वाला एक पारलौकिक शरीर होना) और सामीप्य (भगवान के निकट उसके सहयोगी या सेवकों में से एक के रूप में रहना) शामिल हैं। ऐसी अन्य पूर्णताएँ भी हैं। वे "अन्य," इस श्लोक में -आदौ अंत से सामीप्यादौ शब्द में निहित हैं, भगवान की सेना के कमांडर के रूप में या भगवान के चरणों की मालिश करने या उनके बालों को संवारने वाले व्यक्तिगत सेवक के रूप में पोस्ट की जाने जैसी उपलब्धियाँ हैं। सायुज्य की पूर्णता, ईश्वर के अस्तित्व में विलय होना, अवैयक्तिकों द्वारा बेशकीमती है, लेकिन वैकुण्ठ में नहीं पाया जाता है। भक्ति पूर्णता के बजाय, सायुज्य अवैयक्तिक मुक्ति का एक रूप है। यहाँ तक कि राक्षस जो भगवान के व्यक्तित्व से घृणा करते हैं, उन्हें कभी-कभी भगवान पर एक दुश्मन के रूप में लगातार ध्यान करने के लिए सायुज्य के रूप में पुरस्कार दिया जाता है। लेकिन जिसने भी सर्वोच्च भगवान की भक्ति सेवा का स्वाद चखा है, वह सायुज्य को अस्वीकार कर देता है।
कोई पूछ सकता है, "लेकिन क्या वैकुण्ठ में एक भक्त असाधारण रूप से योग्य होने के कारण कुछ विशेष पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता है?" नहीं, यह श्लोक उत्तर देता है। चूँकि वैकुण्ठ एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं, वहाँ पहले से उपलब्ध पूर्णताओं से परे कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।
