श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.1.18 
पर्यवस्यति सारूप्य-
सामीप्यादौ च तुल्यता
न श्रूयते परं प्राप्यं
वैकुण्ठाद् अधिकं कियत्
 
 
अनुवाद
इसका अर्थ यह है कि वैकुंठ में भक्तों के बीच विशेष वैकुंठ सिद्धियों, जैसे परम भगवान के निकट निवास करना या उनके समान स्वरूप प्राप्त करना, में भी समानता होती है। और वैकुंठ से भी ऊँचा कोई लक्ष्य सुनने में नहीं आता।
 
This means that devotees in Vaikuntha also have equality in the special Vaikuntha siddhis, such as residing near the Supreme Lord or attaining a form similar to His. And no higher goal than Vaikuntha is heard of.
तात्पर्य
कोई यह सोच सकता है कि भले ही वैकुण्ठ में सभी भक्त भगवान के व्यक्तित्व की सेवा करने के आनंद में समान रूप से साझा करते हैं, फिर भी अधिक और कम व्यस्तताओं का कुछ पदानुक्रम देखा जा सकता है। वास्तव में, ऐसा लगता है कि वैकुण्ठ में भगवान की सर्वोच्च शासन और ऐश्वर्य की लीलाएँ कुछ भक्तों को दूसरों की तुलना में अधिक पूर्ण रूप से प्रकट होती हैं, जैसे भौतिक दुनिया में भगवान उन भक्तों के लिए अधिक अंतरंग रूप से प्रकट होते हैं जो उन्हें ब्रह्म-सत्र (पारलौकिक ज्ञान का त्याग) द्वारा पूजते हैं, बजाय इसके कि वे लोग जो उन्हें कर्म-सत्र (मात्र कर्मकांडीय बलिदान) के स्थूल स्तर पर पूजते हैं। वैकुण्ठ में कुछ भक्त, जैसे कि भगवान के राज्य की सीमाओं पर द्वारपाल के रूप में तैनात, उन भक्तों की तुलना में अपेक्षाकृत बाहरी प्रतीत होते हैं जिनके पास अधिक अंतरंग सेवाएँ हैं, जैसे भगवान के कमल चरणों की मालिश करना। अंततः, हालांकि, वैकुण्ठ में भक्ति सेवा की यह सभी किस्में समान हैं, जो श्रद्धा में दास्य-रस के मूड में छोटी विविधताएं प्रदर्शित करती हैं।

वैकुण्ठ की अनेक प्रकार की पूर्णताएँ एक ही बुनियादी सेवा के समान अभिव्यक्तियाँ हैं। उन पूर्णताओं में सारूप्य (भगवान की तरह चार भुजाओं और अन्य विशेषताओं वाला एक पारलौकिक शरीर होना) और सामीप्य (भगवान के निकट उसके सहयोगी या सेवकों में से एक के रूप में रहना) शामिल हैं। ऐसी अन्य पूर्णताएँ भी हैं। वे "अन्य," इस श्लोक में -आदौ अंत से सामीप्यादौ शब्द में निहित हैं, भगवान की सेना के कमांडर के रूप में या भगवान के चरणों की मालिश करने या उनके बालों को संवारने वाले व्यक्तिगत सेवक के रूप में पोस्ट की जाने जैसी उपलब्धियाँ हैं। सायुज्य की पूर्णता, ईश्वर के अस्तित्व में विलय होना, अवैयक्तिकों द्वारा बेशकीमती है, लेकिन वैकुण्ठ में नहीं पाया जाता है। भक्ति पूर्णता के बजाय, सायुज्य अवैयक्तिक मुक्ति का एक रूप है। यहाँ तक कि राक्षस जो भगवान के व्यक्तित्व से घृणा करते हैं, उन्हें कभी-कभी भगवान पर एक दुश्मन के रूप में लगातार ध्यान करने के लिए सायुज्य के रूप में पुरस्कार दिया जाता है। लेकिन जिसने भी सर्वोच्च भगवान की भक्ति सेवा का स्वाद चखा है, वह सायुज्य को अस्वीकार कर देता है।

कोई पूछ सकता है, "लेकिन क्या वैकुण्ठ में एक भक्त असाधारण रूप से योग्य होने के कारण कुछ विशेष पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता है?" नहीं, यह श्लोक उत्तर देता है। चूँकि वैकुण्ठ एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं, वहाँ पहले से उपलब्ध पूर्णताओं से परे कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)