श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 174-175
 
 
श्लोक  2.1.174-175 
तद् भुक्त्वा सत्वरं ब्रह्मन्
भगवन्-मन्दिरं पुनः
प्रविश्याश्चर्य-जातं यन्
मया दृष्टं मुदां पदम्

हृदि कर्तुं न शक्यते
तत् कथं क्रियतां मुखे
एवं तत्र दिवा पूर्णं
स्थित्वानन्दो ’नुभूयते
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण, उस महाप्रसाद को ग्रहण करने के बाद मैं शीघ्र ही भगवान के मंदिर में पुनः प्रवेश कर गया। वहाँ मैंने जो अद्भुत दृश्य देखे, उनसे मुझे आनंद का ऐसा भंडार मिला जिसे मैं अपने हृदय में समझ नहीं पा रहा हूँ, मुँह से वर्णन करना तो दूर की बात है। मैं बस वहीं खड़ा रहा, आनंद का आनंद लेता रहा।
 
O Brahmin, after partaking of that great offering, I quickly re-entered the Lord's temple. The wondrous sights I witnessed there filled me with such joy that I cannot even comprehend it in my heart, let alone describe it with my mouth. I simply stood there, enjoying the bliss.
तात्पर्य
गोपा-कुमार का हृदय उन सब कुछ का आत्मसात नहीं कर पाया जिसका वह आनंद ले रहा था - एक के बाद एक अद्भुत बात बिना रुके, और हर आश्चर्य अकल्पनीय। फिर, क्या वह सही ढंग से वर्णन कर सकता था कि उसने क्या देखा? भाषण की शक्ति आमतौर पर मन की शक्ति से धीमी और अधिक सीमित होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)