श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  2.1.168 
तत्राग्रतो गन्तु-मनाश् च नेशे
प्रेम्णा हतो वेपथुभिर् निरुद्धः
रोमाञ्च-भिन्नो ’श्रु-विलुप्त-दृष्टिः
स्तम्भं सुपर्णस्य कथञ्चिद् आप्तः
 
 
अनुवाद
शुद्ध प्रेम के आनंद में डूबी और शरीर की कम्पन से बाधित, मैं चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी। फिर भी किसी तरह मैं गरुड़ के स्तंभ तक पहुँच गई, मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे, मेरी दृष्टि आँसुओं से धुंधली हो गई थी।
 
Immersed in the bliss of pure love and hindered by trembling in my body, I couldn't move forward even if I wanted to. Yet somehow, I reached the eagle's pillar, my hair standing on end, my vision blurred by tears.
तात्पर्य
गोप-कुमार भगवान जगन्नाथ के मंदिर में प्रवेश करने के लिए उत्सुक थे, लेकिन आगे बढ़ने में उन्हें कठिनाई हो रही थी क्योंकि उनका मन प्रेम से भरा हुआ था और उनका शरीर जाड्य के आनंद से स्तब्ध था। स्वयं के संचलन से अनजान केवल भगवान की दया से गोप-कुमार उस स्तंभ तक पहुँचे जहाँ भगवान जगन्नाथ की वेदी के सामने गरुड़ बैठे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)