यद् अन्नं पाचयति लक्ष्मीर्
भोक्ता च पुरुषोत्तमः
स्पृष्टास्पृष्टं न मन्तव्यं
यथा विष्णुस्तथैव तत्
"जिस भोजन को लक्ष्मी पकाती है और भगवान पुरुषोत्तम खाते हैं, उसे यह विचार किए बिना ग्रहण करना चाहिए कि उसको किसी ने छुआ है या नहीं। वह भगवान विष्णु स्वयं के समान शुद्ध है।"
स्कन्द पुराण आगे कहता है:
चिर-स्थम अपि संशुष्कं
नीतं वा दूर-देशतः
यथायथोपभुक्तं सत्
सर्व-पापापनोदनम्
"यदि भगवान जगन्नाथ का प्रसाद बहुत समय से पड़ा रहने के कारण पूरी तरह से सूख गया है या दूर देश से लाया गया है, तो भी यदि उसको उचित भावना से खाया जाए तो वह निश्चित रूप से सभी पापों को दूर कर देगा।"
भाविष्य पुराण के अनुसार:
अन्त्य-वर्णैर् हीन-वर्णैः
संकर-प्रभवैर् अपि
स्पृष्टं जगत्-पतेर् अन्नम्
भुक्तं सर्वाघ-नाशनम्
"यदि ब्रह्माण्ड के स्वामी द्वारा खाया गया भोजन अछूतों, जातिहीन लोगों या मिश्रित जातियों में जन्मे लोगों द्वारा छुआ गया है, तब भी उसमें सभी पापों को नष्ट करने की शक्ति रहती है।"
तत्त्व-यामल के अनुसार:
नास्ति तत्रैव राजेन्द्र
स्पृष्टास्पृष्ट-विवेचनम्
यस्य संस्पृष्ट-मात्रेण
यान्त्य अमध्य-पवित्रताम्
"हे राजाओं में श्रेष्ठ, किसी को इस बात की चिंता कभी नहीं करनी चाहिए कि क्या किसी ने भगवान जगन्नाथ के प्रसाद को छुआ है। यदि वैदिक यज्ञों में भाग लेने के अयोग्य व्यक्ति भी इस प्रसाद को स्पर्श कर लेते हैं, तो वे पूरी तरह से पवित्र हो जाते हैं।"
और गरुड़ पुराण के अनुसार:
ना काल-नियमो विप्रा
व्रते चान्द्रायणे यथा
प्राप्त-मात्रेण भुंजीत
यदीच्छेन मोक्षम् आत्मनः
"हे ब्राह्मण, इस प्रसाद को कब ग्रहण करना है, इसके बारे में कोई प्रतिबंध नहीं हैं जैसा कि चान्द्रायण जैसे व्रतों के पालन में होते हैं। जब भी किसी को भगवान जगन्नाथ का प्रसाद प्राप्त होता है तो अगर वह आत्मा की मुक्ति चाहता है तो उसे उसको तुरंत खाना चाहिए।"
