श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  2.1.161 
तस्यान्नं पाचितं लक्ष्म्या
स्वयं भुक्त्वा दयालुना
दत्तं तेन स्व-भक्तेभ्यो
लभ्यते देव-दुर्लभम्
 
 
अनुवाद
“अपनी पत्नी लक्ष्मी द्वारा अपने लिए पकाए गए भोजन को खाने के बाद, सर्व-दयालु भगवान अपने भक्तों को अपना अवशेष वितरित करते हैं, जो नीलचल में उपलब्ध है, यद्यपि देवताओं को वे दुर्लभ रूप से प्राप्त होते हैं।
 
“After eating the food cooked for Him by His consort Lakshmi, the all-merciful Lord distributes His remains to His devotees, which are available in Nilachal, although the demigods rarely get them.
तात्पर्य
भगवान विष्णु की थाली में बचा हुआ भोजन पाना बहुत कठिन है। लेकिन नीलाचल में, देवी लक्ष्मी के भगवान जगन्नाथ के लिए व्यक्तिगत रूप से भोजन पकाने के बाद, भगवान हर भोजन ग्रहण करते हैं और फिर अपने भक्तों को उनके अवशेष स्वतंत्र रूप से बाँटते हैं। सर्वदयालु होने के कारण, भगवान जगन्नाथ खुद इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके सभी भक्तों को उनका प्रसाद मिले। जब भगवान के लिए पकाया गया सारा भोजन कई मिट्टी के बर्तनों में उनके सामने रखा जाता है, तो कभी-कभी वे हर भोजन का थोड़ा सा खाते हैं, और कभी-कभी वे सारा खा लेते हैं और फिर चमत्कारिक रूप से बर्तनों को भर देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)