श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  2.1.160 
महा-विभूतिमान् राज्यम्
औत्कलं पालयन् स्वयम्
व्यञ्जयन् निज-माहात्म्यं
सदा सेवक-वत्सलः
 
 
अनुवाद
"अनंत ऐश्वर्य से युक्त, वे भगवान स्वयं उत्कल राज्य पर शासन करते हैं। वे अपनी अद्वितीय महिमा प्रकट करते हैं और अपने भक्तों का सदैव स्नेहपूर्वक ध्यान रखते हैं।"
 
"Possessed of infinite opulence, the Lord Himself rules over the kingdom of Utkala. He manifests His matchless glory and always lovingly cares for His devotees."
तात्पर्य
उड़ीसा का एक अन्य नाम उतकल है। भगवान जगन्नाथ स्वयं इस राज्य पर शासन करते हैं और नागरिकों के व्यापार और व्यक्तिगत मामलों के संचालन के लिए विभिन्न आदेश और दिशानिर्देश जारी करते हैं। जैसा कि तत्व-यामल में कहा गया है:

भारते चोत्कले देशे

भू-स्वर्गे पुरुषोत्तमे

दारु-रूपी जगन्नाथो

भक्तानां अभय-प्रदः

नर-चेष्टां उपादाया

आस्ते मोक्षैक-कारकः

"भारतवर्ष में उतकल राज्य में, पुरुषोत्तम का सांसारिक स्वर्ग स्थित है। वहाँ भगवान जगन्नाथ लकड़ी के रूप में प्रकट होते हैं। मानवीय गतिविधियों को संभालते हुए, वह अपने भक्तों को निडरता प्रदान करते हैं। वह मुक्ति के एकमात्र दाता हैं।"

भगवान जगन्नाथ अपनी महिमा का प्रदर्शन करते हैं, जैसे दुर्भाग्यपूर्ण आत्माओं पर उनकी दया। विशेष रूप से अपने सेवकों के प्रति स्नेही, वह उनके अपराधों को कभी भी गंभीरता से नहीं लेते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)